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पंचायत चुनाव: फैशन डिजाइनर बेटी बनी सरपंच, अब गांव की बदलेगी डिजाइन

अलवर जिले के थानागाजी क्षेत्र के अजबपुरा गांव की बेटी प्रियंका नरूका ने ग्लैमर की दुनिया में जाने के बजाय गांव में बदलाव की ओर आगे कदम बढ़ाया है।

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अलवर

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kamlesh sharma

Oct 08, 2020

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अलवर। मौका मिलने पर शहरों की चकाचौंध दुनिया का हिस्सा कौन नहीं बनना चाहता। म्यूजिक में ग्रेजुएशन के बाद फैशन डिजाइनिंग तो अपने आप ही ग्लैमर है। लेकिन, अलवर जिले के थानागाजी क्षेत्र के अजबपुरा गांव की बेटी प्रियंका नरूका ने ग्लैमर की दुनिया में जाने के बजाय गांव में बदलाव की ओर आगे कदम बढ़ाया है।

जयपुर में राजनीति विज्ञान की पढ़ाई के बाद फैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया। बीच-बीच में गांव आते समय महिलाओं को दूर-दूर से हैण्डपम्प व बोरिंग से पानी ढोते देखा तो खुद को रोक नहीं सकी। मन में यह प्रण कर लिया कि मुझे गांव का डिजाइन बदलना है। जिसे पूरा करने के लिए राजनीति का हिस्सा बनना जरूरी समझा और मौका मिलते ही सरपंच बन गई। अब अजबपुरा ग्राम पंचायत की सरपंच खुद महिलाओं के बीच जाने लगी हैं।

वोट के समय उन्होंने महिलाओं से ये वादा भी किया कि दशकों से पुरुषों के हाथ गांव की सत्ता सौंपी है, एक बार बेटी को भी आजमा कर देखो। उनके इस तरह के प्रचार ने जनता का दिल जीत लिया और पहले ही प्रयास में 26 साल की उम्र में गांव की सरपंच बन गई। इस ग्राम पंचायत में दो बड़े गांव अजबपुरा व प्रेमपुरा हैं। जिनमें कुल 3 हजार 600 मतदाता हैं।

शिक्षा, संकल्प व सपना
सरपंच प्रियंका नरूका ने अलवर के जीडी कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर से राजनीतिक विज्ञान विषय से एमए की है। इसेक बाद जयपुर में एलन इंस्टीट्यूट और ज्योतिबा फुले यूनिवर्सिटी से फैशन डिजाइनिंग कोर्स किया। फैशन व संगीत के अलावा नई-नई चीजों को समझना उनकी हॉबी है। गांव में स्कूटी पर दिखती है। वैसे कार भी चलाने लगी हैं। बड़ी मोटरसाइकिल चलाने का भी शौक है। प्रियंका का बड़ा भाई सामाजिक सुरक्षा अधिकारी है। दो- बहन-भाई अध्ययनरत हैं। पिता प्राचार्य के पद से सेवानिवृत हुए हैं।

गांव में पानी और रोशनी का इंतजाम
गांव में पानी और रोशनी का इंतजाम पहली प्राथमिकता पर रहेगा। प्रियंका का कहना है कि बहुएं दूर-दूर से पानी लाती हैं। वे रोजाना सिर पर टोकनी व मटकी लिए ही नजर आती हैं। उनके जीवन में नया सवेरा करना मकसद है। उन परिवारों की राह आसान करनी है।

जिनके घरों में माताओं को डिलीवरी होने पर अस्पताल तक ले जाना मुश्किल हो जाता है। रात्रि को घर से झांके तो उजियारा नजर आए। रोडलाइट नाम की कोई चीज नहीं है। ये सपने जल्दी साकार करने के साथ सबको दिखाना है कि बेटी को किसी लायक बनाया तो गांव का सिर ऊंचा करने का काम हुआ है। ताकि आगे आरक्षित सीटों पर ही नहीं बल्कि हर तरह की सीटों पर बेटियां आगे आकर चुनाव लड़ें। सरकार में भागीदारी निभाएं और बेहतर भारत की तस्वीर बनाने का काम करें।