
यहां न तो डाक्टर मिलते हैं और न ही अन्य सुविधाएं
अलवर. जिला मुख्यालय पर संचालित राजकीय गीतानंद शिशु चिकित्सालय में ओपीडी में न तो डाक्टर मिलते हैं और न ही अन्य सुविधाएं। मजबूरी में निजी अस्पतालों में इलाज के लिए जाना पड़ रहा है। कहने को तो यहां पर डॉक्टरों के 11 पद स्वीकृत हैं। लेकिन इसमें से डयूटी पर दो या तीन ही नजर आते हैं। जिनके पास लंबी कतार लगी रहती है। अक्सर हालात यह रहते हैं कि इलाज के लिए आने वाले बच्चों व उनके परिजनों को घंटों तक डॉक्टर का इलाज करना पड़ता है। यदि डॉक्टर आते भी हैं तो वे ओपीडी, ऑपरेशन आदि के लिए चले जाते हैं। ऐसे हालातों में मासूमों को इलाज मिलना भी मुश्किल हो जाता है।
आज तक नहीं बना शिशु चिकित्सालय : दरअसल इस अस्पताल को वार्ड के रूप में स्वीकृति मिली हुई है। इसी के अनुसार संसाधन व डॉक्टरों के पद स्वीकृत हैं। जबकि यहां पर शिशु चिकित्सालय का संचालन किया जा रहा है। जबकि चिकित्सालय के अनुसार न तो यहां संसाधन है और न ही डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ, वार्ड बॉय आदि । सही इलाज नहीं मिलने के कारण आए दिन यहां मरीज के परिजनों व डॉक्टरों के बीच झड़प भी हो जाती है।
वार्ड में भर्ती बच्चों की नहीं हो रही सही देखभाल: शिशु चिकित्सालय में डॉक्टरों के करीब 11 पद स्वीकृत हैं। इसमें 3 डॉक्टर एफबीएनसी यूनिट में , एक कुपोषण वार्ड में, तीन ओपीडी में, तीन ईटेट वार्ड में, करीब तीन अवकाश पर रहते हैं। ऐसे में अस्पताल में इलाज के लिए आने वाले शिशुओं को देखने वाले डॉक्टरों की संख्या कम रहती हैं। अस्पताल में 30 वैड के वार्ड संचालित किए जा रहे हैं जबकि यहां पर जो स्टाफ लगाया गया है वह 10 बैड के हिसाब से लगाया गया है। ऐसे में यहां भर्ती बच्चों की देखभाल भी नहीं हो पाती है।
महिला चिकित्सालय का काम हो रहा प्रभावित : शिशु चिकित्सालय महिला चिकित्सालय का ही एक हिस्सा है। महिला चिकित्सालय के अधिकतर डॉक्टर, वार्ड बॉय, नर्सिंग कर्मी आदि यहां पर डयूटी देते हैं। ऐसे में महिला चिकित्सालय का काम भी प्रभावित होता है।
सूचना बोर्ड कर रहा भ्रमित: शिशु चिकित्सालय में सूचना बोर्ड लगाया गया है। जिसमें अस्पताल में कार्यरत डॉक्टरों की सूची लगाई गई है। लेकिन इसमें आज तक यह नहीं लिखा गया कि कौन डॉक्टर डयूटी पर हैं। ऐसे में मरीज भ्रमित होते रहते हैं।
Updated on:
02 Mar 2019 01:05 pm
Published on:
02 Mar 2019 01:05 pm
