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इस जिले में हैं महाभारतकालीन लेटे हुए हनुमानजी, जिन्होंने तोड़ा था भीम का अहंकार

राजस्थान के अलवर जिले के सरिस्का बाघ परियोजना के अंर्तगत पांडुपोल हनुमान जी का मंदिर स्थित है।

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अलवर

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Jyoti Kumar

Jun 02, 2023

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अलवर। Pandupol Hanuman Temple: राजस्थान के अलवर जिले के सरिस्का बाघ परियोजना के अंर्तगत पांडुपोल हनुमान जी का मंदिर स्थित है। पांडूपोल हनुमान मंदिर अलवर शहर के करीब 55 किलोमीटर दूर है। सरिस्का के बीचों-बीच स्थित इस हनुमान मंदिर का इतिहास महाभारत काल से है। इस मंदिर को लेकर किवदंती है कि महाभारत काल में अज्ञातवास के दौरान भीम ने अपनी गदा से पहाड़ में प्रहार किया था। उनके गदा के एक वार से पहाड़ टूट गया और पांडवों के लिए रास्ता बन गया।

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ऐसी मान्यता है कि पांडूपोल में बजरंग बली ने भीम को दर्शन दिए थे। महाभारत काल की एक घटना के अनुसार इसी अवधि में द्रौपदी अपनी नियमित दिनचर्या के अनुसार इसी घाटी के नीचे की ओर जलाशय पर स्नान करने गई थी। स्नान करने के दौरान नाले में ऊपर से जल में बहता हुआ एक सुन्दर पुष्प आया। जिसको प्राप्त कर द्रोपदी उसे अपने कानों के कुण्डलों में धारण करना चाहती थी। स्नान के बाद द्रोपदी ने महाबली भीम को वह पुष्प लाने को कहा तो महाबली भीम पुष्प की खोज करता हुआ जलधारा की ओर बढ़ने लगे। आगे जाने पर महाबली भीम ने देखा की एक वृद्ध विशाल वानर अपनी पूंछ फैलाकर रास्ते में आराम से लेटा हुआ है। वानर के लेटने से रास्ता पूर्णतया अवरुद्ध हो गया था।

संकरी घाटी होने के कारण भीमसेन के आगे निकलने के लिए कोई ओर मार्ग नही था। इसलिए भीम ने मार्ग में लेटे हुए वृद्ध वानर से कहा कि तुम अपनी पूंछ को रास्ते से हटाकर एक ओर कर लो। तो उत्तर में वानर ने कहां कि मै वृद्ध अवस्था में हूं। आप इसके ऊपर से चले जाएं। भीम ने कहा कि मैं इसे लांघकर नहीं जा सकता। आप पूंछ हटाएं। इस पर वानर ने कहा कि आप बलशाली दिखते हैं, आप स्वयं ही मेरी पूंछ को हटा लें। भीमसेन ने वानर की पूंछ हटाने की कोशिश की लेकिन पूंछ टस से मस भी ना हुई। भीमसेन के बार बार कोशिश करने के बाद भी वह वृद्ध वानर की पूंछ को नही हटा सके और समझ गए कि यह कोई साधारण वानर नहीं हैं।

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इसके बाद भीमसेन ने हाथ जोड़ कर वृद्ध वानर को अपने वास्तविक रूप में आने की विनती की। इस पर वृद्ध वानर ने अपना वास्तविक रूप में आकर अपना परिचय हनुमान के रूप में दिया। भीमसेन ने सभी पांडव को वहां बुला कर वृद्ध वानर की लेटे हुए रूप में ही पूजा अर्चना की। इसके बाद पांडवों ने वहां हनुमान मंदिर की स्थापना की जो आज पांडुपोल हनुमान मंदिर नाम से मशहूर है। अब हर मंगलवार व शनिवार को यहां भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इसके साथ ही यह मंदिर अब जन-जन की आस्था का केन्द्र बन गया है।