
फोटो - प्रतीकात्मक
पार्वती- कालीसिंध -चंबल पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (पीकेसी-ईआरसीपी) के जरिए अलवर जिले की धरती की प्यास बुझाने की तैयारी चल रही है। ईआरसीपी का पानी 150 किलोमीटर दूरी तय करके कैनाल के माध्यम से अलवर के जयसमंद, धमरेड़ और घाट बांध में पानी आएगा। योजना पर करीब 6492 करोड़ रुपए खर्च होंगे। इसमें एक जलाशय का निर्माण किया जाएगा। केवल अलवर शहर के लिए 200 मीट्रिक क्यूबिक पानी मिलेगा। इससे शहरी आबादी की प्यास बुझेगी।
करौली जिले के खुर्रा-चैनपुरा से अलवर जिले की राजगढ़ तहसील में नहर प्रवेश करेगी। योजना का पानी राजगढ़ के धमरेड़ बांध में आएगा। उसके बाद कैनाल के माध्यम से नटनी के बारां में पानी पहुंचेगा। यहां से पानी को दो भागों में बांटा जाएगा। इसमें एक लिंक नहर जयसमंद बांध और दूसरी लिंक नहर रूपारेल नदी के माध्यम से घाट बांध में पानी लेकर जाएगी। बताया जा रहा है कि जयसमंद बांध में नहर का पानी आने के बाद लिट करके पानी को सिलीसेढ़ में पहुंचाया जाएगा। वहीं, रामगढ़, किशनगढ़बास, मुंडावर, तिजारा, बहरोड़ और नीमराणा में पानी पार्वती-कालीसिंध और चंबल से पहुंचाने की तैयारी चल रही है।
इधर, सिलीसेढ़ से पानी लाने की योजना धीमी गति से चल रही है। ऐसे में गर्मियों तक शहर के लोगों की प्यास बुझना संभव नहीं है। अब लोग नगर निगम को उमीद भरी नजर से देख रहे हैं। यदि निगम हर वार्ड में दो-दो सिंगल फेस बोरिंग कराने में सफल हो गया तो जनता को गर्मियों में राहत मिल सकती है। निगम बोर्ड ने एक साल पहले हर वार्ड में दो-दो सिंगल फेस बोरिंग कराने का प्रस्ताव पास किया था।
इस तरह 65 वार्डों में 130 बोरिंग लगनी थी। निगम को हर पार्षद से उन जगहों का प्रस्ताव लेना था, जहां बोरिंग लगनी थी, लेकिन यह कार्य आज तक नहीं हो पाया। पूर्व पार्षदों का कहना है कि यदि निगम चाहे तो शहर में काफी हद तक पानी संकट दूर हो सकता है, लेकिन सिंगल फेस बोरिंग के लिए कदम नहीं बढ़ाए जा रहे। अब गर्मियों से पहले यह काम कराना चाहिए।
धमरेड़ बांध से नटनी का बारा- 45 से 50 किमी
नटनी के बारा से जयसमंद बांध- 12 किमी
नटनी के बारा से लेकर रूपारेल सहित घाट बांध- 40 किमी
जयसमंद बांध से सिलीसेढ़ की दूरी - 8 किमी
भूजल वैज्ञानिकों के अनुसार प्रत्येक वर्ष पानी रसातल में डेढ़ से दो मीटर पहुंच रहा है। इससे अलवर के कई इलाकों में पानी आवश्यकता बढ़ती जा रही है और कई क्षेत्रों में पानी की कमी से फसल पैदा होना कम हो गई है, लेकिन अब किसानों की निगाहें पीकेसी-ईआरसीपी के पानी पर टिकी हैं। इसके पानी से ही बंजर जमीन भी हरी-भरी हो सकेगी।
Published on:
26 Dec 2024 01:14 pm
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