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मामूली चिंगारी से तबाह हो सकता है सरिस्का का जंगल, अमेजन की भयानक आग के बाद भी नहीं सीखा सबक

अमेजन की भयावह आग से राज्य सरकार ने नहीं सीखा सबक आज भी पीट-पीटकर बुझाते हैं आग खतरे में है 200 से ज्यादा प्रजाति की वनस्पति
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अलवर

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Prem Pathak

Sep 05, 2019

After Ranthambore, now hunters roam the Sariska forest area

After Ranthambore, now hunters roam the Sariska forest area

अलवर. राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली समेत पूरे एनसीआर के ऑक्सीजन के बड़े स्रोत सरिस्का के जंगल आग के मुहाने पर बैठे हैं। अमेजन समेत दुनिया के बड़े जंगलों में विकराल आग के बाद भी राज्य सरकार ने कोई सबक नहीं सीखा है। करीब 12 सौ वर्ग किलोमीटर में फैले सरिस्का में ज्वलनशील पेड़ धोक, चुरैल और खैर की भरमार है और मामूली चिंगारी ही आग को भडक़ा सकती है। जब पूरी दुनिया में बड़े जंगलों में आग की निगरानी के लिए पानी के टैंक लेकर हेलीकॉप्टर दिन-रात उड़ान भरते हैं तब सरिस्का प्रशासन परम्परागत फायर लाइन एवं फायर बीटिंग सिस्टम तक सीमित है।

sariska fire problem news खतरे में हैं 200 से ज्यादा प्रजाति की वनस्पति

सरिस्का 1213 वर्ग किलोमीटर में फैला है और यहां 200 से ज्यादा प्रजाति की वनस्पति हैं। इनमें धोक, खैर, सालर, बोडल, चुरेल, बड़, पीपल, गूलर, बांस, पलाश (ढाक ), झींग्या, ताल (अर्जुन) सहित अनेक प्रकार के पेड़ और घास हैं। बारिश के दिनों में हरियाली जंगल पर चादर की तरह बिछ जाती है जिससे वन्यजीव तो दूर आदमी को भी देख पाना मुश्किल हो जाता है लेकिन गर्मी में ज्वलनशील पेड़ों तथा सूखी घास की वजह से हर समय आग लगने की आशंका रहती है।

चार दिन सुलगती रही आग

सरिस्का के जंगलों में गत एक दशक की सबसे बड़ी आग वर्ष 2009-10 में टहला रेंज के नारायणी माता मंदिर के पीछे की ओर लगी। आग करीब चार दिन तक दिन रात सुलगती रही। आग ने कई वर्ग किलोमीटर में वनस्पति को पूरी तरह नष्ट कर दिया। इसके अलावा हर साल लगने वाली आग पर भी चार-पांच घंटे में काबू पाना संभव नहीं हो पाता। अलवर बफर क्षेत्र में भी दो-तीन साल पहले आग लगी जो 12 घंटे से ज्यादा समय बाद मुश्किल से बुझ पाई।

झाडिय़ों और पत्तों की झाडू से बुझाते हैं

सरिस्का में हर साल करोड़ों रुपए का बजट नए संसाधन जुटाने को आता है, लेकिन आग बुझाने के लिए विभाग अब भी पुराने तरीकों पर निर्भर है। सरिस्का में फायर लाइन काटकर एवं फायर बीटिंग सिस्टम से आग बुझाई जाती है। गर्मी के दिनों में जंगल व पहाडिय़ों में फायर लाइन काटी जाती है। इस परम्परागत पद्धति में आग फायर लाइन से आग नहीें बढ़ पाती और बुझ जाती है। वहीं फायर बीटिंग में झाडिय़ों व पत्तों को झाडू की तरह बांधा जाता है। इससे आग को पीट-पीट कर बुझाया जाता है। इसके अलावा आग वाले स्थान के पास उपलब्ध होने पर पानी का भी उपयोग किया जाता है।

यहां लगती है ज्यादातर आग

सरिस्का में ज्यादातर आग की घटनाएं किरास्का, रोटक्याला, अलवर बफर सहित आसपास के जंगल में हुई हैं। सरिस्का में लापला घास बहुतायत में है। गर्मी के दिनों में यह घास सूख जाती है। इस घास की खासियत है कि यह तापमान बढऩे एवं घर्षण होने पर आग पकड़ लेती है।

दिल्ली में आ सकती है ऑक्सीजन की कमी

वन एवं पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि दिल्ली से करीब दो सौ किलोमीटर दूर स्थित सरिस्का पूरे एनसीआर का सबसे बड़ा जंगल है और ये दिल्ली तक की आबोहवा को शुद्ध करता है। अगर इस जंगल में अमेजन जैसी आग लगी तो एनसीआर के आसमान में ओजोन परत को भारी नुकसान पहुंच सकता है। इससे दिल्ली तक ऑक्सीजन की कमी आ सकती है।