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127 साल पहले स्वामी विवेकानंद ने अलवर वासियों को कहा था, अलवर निवासी युवकों तुम लोग जितने भी यो सभी योग्य हो

स्वामी विवेकानंद ने 127 साल पहले कहा था अलवर निवासी युवकों तुम लोग जितने भी हो सभी योग्य हो।
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अलवर

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Hiren Joshi

Jan 12, 2019

Swami Vivekanand Jayanti 2018 : Swami Vivekanand Alwar Story

127 साल पहले स्वामी विवेकानंद ने अलवर वासियों को कहा था, अलवर निवासी युवकों तुम लोग जितने भी यो सभी योग्य हो

अलवर. 127 साल पहले दुनिया को जगाने आया सन्यासी नरेन्द्र से विवेकानन्द बनने की यात्रा में कई बार अलवर आए। स्वामी विवेकानन्द ने 1893 में अमेरिका के शिकागो में हुए विश्व धर्म सम्मेलन में पहुंचकर खुद के भाषण से पूरी दुनिया को चौंका दिया था। उसके बाद विवेकानन्द हमेशा के लिए सन्यासी से स्वामी हो गए। इससे करीब दो साल पहले स्वामी अलवर आए तब उन्होंने अलवर के युवाओं के लिए बड़ी बात उनके शिष्य लाला गोविन्द सहाय को लिखे पत्र में कही। ‘अलवर निवासी युवकों तुम लोग जितने भी हो सभी योग्य हो और मैं आशा करता हूं कि तुममें से अनेक व्यक्ति अविलम्ब ही समाज के भूषण तथा जन्म भूमि के कल्याण का कारण बन सकेंगे। यदि संसार की ओर से कभी- कभी तुमको थोड़ा बहुत धक्का भी खाना पड़े तो उससे विचलित न होना, मुहूर्त भर में वह दूर हो जाएगा तथा सारी स्थिति पुन: ठीक हो जाएगी’।

स्वामी विवेकानन्द ने सबसे पहले 1891 में 7 फरवरी से 31 मार्च तक अलवर प्रवास किया। इसके बाद 1897 में भी अलवर आए। अलवर से उनका इतना लगाव रहा है कि कुछ ही दिनों में उनके कई मित्र बन गए। जो उनके साथ धार्मिक चर्चाएं, धर्म की गूढ़ बातें करने के अलावा भक्ति गीत गाते थे। स्वामीजी ने अलवर शहर, पाण्डूपोल हनुमानजी, टहला में राजोरगढ़ में नीलकण्ठ महादेव, नारायणी देवी के दर्शन भी किए। दूसरी बार 1897 में अलवर आए तब जनता ने उनका खूब स्वागत किया।

स्वामीजी के अलवर में प्रमुख शिष्य लाला गोविन्द सहाय विजयवर्गीय परिवार रहा। जिनके पास स्वामी के लिखे पत्र अभी तक मौजूद हैं। पंडित शम्भूनाथ इंजीनियर, डॉ. गुरुचरण, मुंशी जगमोहन, फैज अली, नारायण दास शास्त्री थानागाजी वाले, दीवान कर्नल रामचन्द्र परिवार को भी स्वामीजी ने कुछ पत्र लिखे हैं। ये पत्र शोध करने वाले विद्यार्थी लेकर गए थे। जो अभी तक वापस नहीं किए गए हैं। डॉ. सुगनाबाई व उनकी बहन भी स्वामीजी की शिष्य बनी। बाद में पूर्व महाराजा जय सिंह ने 1924 में लिखा कि स्वामी विवेकानन्द और रामकृष्ण परमहंस के साहित्य को हिन्दी में प्रकाशनार्थ किया जाए। जिसके लिए 2 हजार रुपए का सहयोग भी दिया गया।