
तीज त्योहार में अब गुम हो रही पहले वाली रौनक, जानिए पहले अलवर में किस तरह मनाई जाती थी तीज
अलवर. बाग में पपीहा बोले, मैं जानूं कोई आयगो, सावन आयो मेरी अम्मा, मेरो रंगीलो अभी नाय आयो —— जैसे पारंपरिक गीतों के माध्यम से नई नवेली दुल्हन अपने प्रियतम को याद किया करती थी। यह मौका होता था सावन का। ऐसा माना जाता था कि यदि सावन में गीत नहीं गाए तो सावन में बरसात नहीं होगी और सारा सावन सूखा ही निकल जाएगा। यही वजह थी कि हर जगह गीत, झूलें आदि का माहौल महिने भर बना रहता था।
लेकिन अब सावन के गीत और झूले यादों में सिमट कर रह गए है। शहर में केवल लेडिज क्लब ही हैं जो तीज और त्यौहार को अपने स्तर पर मनाकर इन पर्वो को जिंदा रखे हुए हैं। एकल परिवार होने से तीज त्यौहारों को सामूहिक रूप से मनाने की परंपरा अब सिमट गई है।
पहले सावन में नव विवाहिताएं अपने पीहर आती थी। हरियाली का यह मौसम पति और पत्नी के लिए बहुत खास होता था। इस महिने में पेड़ों की डाल पर झूले डलते थे। जहां नव विवाहिताएं अपनी सखी सहेलियों के साथ हंसी ढिढोली कर सावन के गीत गाती थी। जब सहेलिया पति के बारे में पूछती थी तो सीधे बोलने में नवविवाहिताएं शर्माती थी, सकूचाती थी। इसलिए गीतों के माध्यम से अपने भाव व्यक्त किया करती थी। अब ना सावन के गीत सुनाई देते हैं और ना ही पेड़ों पर झूले दिखाई देते हैं। आज पेड़ भी कहीं ना कहीं अपने उन पुराने दिनों को याद करते होंगे जब उसको महिलाओं का साथ मिलता था।
सावन के गीतों में होती थी पति की मनुहार
ब्रह्मचारी मौहल्ला की रहने वाली कौशल्या देवी ने बताया कि ऐसी परंपरा रही है कि सावन में नवविवाहिता को ससूराल में नहीं रखा जाता। इसलिए सावन लगते ही उन्हें पीहर भेज दिया जाता है। पेड़ पर झूला झूलते समय जितनी ऊचाई तक झोटा लगता था उतना ही अच्छा माना जाता था। ऐसा माना जाता था कि ऊंचाई पर जाने से पति की आयु लंबी होती है। उन्होंने बताया कि गीतों में चंद्रावल और बिणजारा के गीत भी प्रमुखता से गाए जाते थे। नीम और पीपल के पेड़ों पर खास तौर से झूले डलते थे।
Published on:
11 Aug 2018 11:43 am
