
Elephants terror
अंबिकापुर/प्रतापपुर. हाथियों (Elephants terror) से इंसानों की जान बचाने तथा पल-पल का उनका लोकशन जानने वन विभाग द्वारा लाखों रुपए के रेडियो कॉलर पहनाए गए थे। विभाग की मंशा थी कि रेडियो कॉलर से मिले लोकेशन के बाद लोगों को सतर्क कर उनकी जान बचाई जा सकेगी लेकिन ऐसा नहीं हो सका। रेडियो कॉलर पहने हाथी भी आए दिन लोगों की जान ले रहे हैं और विभाग मूकदर्शक बना हुआ है।
ऐसा ही एक मामला शनिवार की सुबह प्रतापपुर वन परिक्षेत्र के 2 इलाकों से सामने आया है। इसमें रेडियो कॉलर पहने प्यारे हाथी ने एक महिला व एक पुरुष को मौत (Elephant attack) के घाट उतार दिया, जबकि 2 को घायल भी कर दिया। दोनों के शव कई टुकड़ों में जंगल में बिखरे मिले। दोनों जंगल में खुखड़ी-पुटू बीनने गए थे।
सूरजपुर जिले के प्रतापपुर वन परिक्षेत्र में इन दिनों 2 दर्जन से अधिक हाथी विचरण कर रहे हैं। इनमें से कुछ हाथियों को वन विभाग द्वारा रेडियो कॉलर भी पहनाया गया है। प्यारे नामक हाथी भी इन्हीं में से एक है और विभाग को उसका लोकेशन भी मिल रहा है। इसके बावजूद वन अमले द्वारा लोगों को सतर्क नहीं किया जा रहा है।
लिहाजा इस हाथी ने एक महिला व एक पुरुष की जान ले ली। प्रतापपुर थाना क्षेत्र के ग्राम पंचायत गोटगवां के तारापानी निवासी सोमनाथ कोड़ाकू पिता ठाकुर प्रसाद शुक्रवार की शाम करीब 4 बजे गांव से लगे जंगल में खुखड़ी-पुटू बीनने गया था।
इसी दौरान प्यारे हाथी से उसका सामना हो गया और हाथी ने उसे पटक-पटक कर मार डाला। उसका शव कई टुकड़ों में जंगल में मिला। वहीं दूसरी घटना शनिवार की सुबह 7.30 बजे की है।
ग्राम पंचायत सरहरी के खेरवाना निवासी सुखमेन चेरवा पति शिवबरन 50 वर्ष गांव के पास ही जंगल में खुखड़ी-पुटू बीनने गई थी, उसे भी प्यारे हाथी ने मार डाला। जबकि हाथियों ने 2 ग्रामीणों को घायल भी कर दिया है। 15 घंटे के भीतर हाथी द्वारा 2 इंसानी जान ले लेने से उनके परिजन व ग्रामीणों में वन विभाग के प्रति आक्रोश का माहौल है।
मौत के बाद पहुंचे अधिकारी
प्यारे हाथी के गले में लगे रेडियो कॉलर से मिले लोकेशन के बाद यदि वन अमले द्वारा उस क्षेत्र के ग्रामीणों को सतर्क कर दिया गया होता तो वे जंगल की ओर न जाते। उनकी जान बच सकती थी लेकिन विभाग के लोग चैन की नींद सोते रहे। सुबह जब दोनों ग्रामीणों की मौत की सूचना उन्हें मिली तो आला अधिकारी दल-बल के साथ मौके पर पहुंचे। हालांकि वन विभाग ग्रामीणों को भी समझाइश देता रहा है कि वे जंगल में न जाएं।
रेडियो कॉलर से किसे हुआ फायदा?
वन विभाग द्वारा यह दावा किया गया था कि दल के किसी हाथी को रेडियो कॉलर पहनाए जाने के बाद उसका लोकेशन विभाग को मिलता रहेगा। ऐसे में इंसानों की जान बचा पाना आसान होगा। फिर विभाग ने पूरे तामझाम के साथ करीब साढ़े 3 लाख रुपए प्रति एक के हिसाब से कई रेडियो कॉलर मंगाए और हाथियों को पहनाया, लेकिन लापरवाह कार्यप्रणाली के कारण उनकी मंशा धरी की धरी रह गई।
आज भी हाथियों से मौत का आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। ऐसे में रेडियो कॉलर का किसे फायदा हुआ, हाथी प्रभावित क्षेत्र के लोगों को या विभाग के अधिकारियों को।
रेस्क्यू सेंटर में शो-पीस बने कुमकी हाथी
रेडियो कॉलर में लाखों रुपए बर्बाद करने के बाद विभाग द्वारा कर्नाटक से 5 कुमकी हाथी मंगाए गए थे। कुमकी हाथियों के संबंध में विभाग द्वारा यह कहा गया कि ये सरगुजा संभाग के उत्पाती हाथियों को कंट्रोल करेंगे, लेकिन धरातल पर ऐसा कुछ होता नहीं दिख रहा है। कुमकी हाथियों व प्रशिक्षित महावतों पर महीने लाखों रुपए खर्च किए जा रहे हैं लेकिन वे रेस्क्यू सेंटर में मात्र शो-पीस बनकर रह गए हैं।
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Published on:
10 Aug 2019 02:47 pm
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