
अलवर में सरकारी विभागों में ब्लैक लिस्ट और अपात्र फर्मों को करोड़ों रुपए के सरकारी ठेके दिलाने का एक संगठित खेल सामने आया है। पिछले एक वर्ष के दौरान सामने आए कई मामलों से यह स्पष्ट होता है कि अलग-अलग विभागों में कुछ फर्मों को अधिकारियों और कर्मचारियों की कथित मिलीभगत से पहले पात्र घोषित किया गया, फिर उन्हें करोड़ों रुपए के टेंडर दिए गए। ये मामले जिला प्रशासन तक भी पहुंचे, लेकिन कोई एक्शन नहीं लिया गया। कुछ मामलों में जरूर टेंडर निरस्त करने या फर्म को डिबार करने की कार्रवाई हुई, पर यह नाकाफी रही।
इससे संगठित खेल को चोट नहीं पहुंची और सरकारी खजाने को नुकसान होता रहा। इन मामलों से यह भी सवाल उठ रहा है कि यदि किसी फर्म ने गलत जानकारी, झूठे शपथ पत्र व तथ्य छिपाकर सरकारी टेंडर प्राप्त किया, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की गई? अब ये मामले सरकार को भेजे गए हैं, जिससे विभागों में हड़कंप मचा हुआ है। इस तरह मालों में एक समान पैटर्न सामने आया है कि फर्मों की ओर से कथित रूप से गलत जानकारी या अपूर्ण दस्तावेज प्रस्तुत कर टेंडर दिए गए और सिस्टम ने मेहरबानी दिखाई।
जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण विभाग (वाटरशेड) में बड़ा खेल हुआ। मालाखेड़ा क्षेत्र में 84.25 लाख रुपए के टेंडर में जिस फर्म को आवश्यक दस्तावेजों के अभाव में अयोग्य घोषित किया गया, उसी फर्म को मात्र 48 घंटे बाद थानागाजी क्षेत्र में 89.92 लाख रुपए का दूसरा टेंडर देने के लिए पात्र घोषित कर दिया गया। दोनों टेंडरों में कार्य लगभग समान प्रकृति के थे और दस्तावेज भी समान बताए गए। ऐसे में सवाल उठा कि जो फर्म पहले टेंडर में अपात्र थी, वह दो दिन बाद दूसरे टेंडर में पात्र कैसे हो गई? मामला सामने आने के बाद जांच शुरू हुई, लेकिन संबंधित फर्म के विरुद्ध ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
वन विभाग ने कार्य अधूरे छोड़ने और अनुबंध की शर्तों का पालन नहीं करने के आरोप में पांच फ़र्मों को एक वर्ष के लिए डिबार किया। इन फर्मों पर आरोप था कि कार्य समय पर पूरा नहीं किया। कई स्थानों पर काम शुरू तक नहीं हुआ, जबकि विभागीय प्रक्रिया आगे बढ़ती रही। सवाल यह है कि यदि कार्य अधूरा छोड़ने से सरकार को आर्थिक नुकसान हुआ, तो केवल डिबार करने से आगे बढ़कर नुकसान की वसूली और जिम्मेदारी तय क्यों नहीं की गई?
रामगढ़ पंचायत समिति में सुरक्षा गार्ड भर्ती के मामले में वित्तीय अनियमितता का मामला सामने आया। आरोप है कि पहले से ब्लैकलिस्टेड फर्म को लगभग आठ महीने तक भुगतान किया जाता रहा। बाद में टेंडर को चुपचाप निरस्त कर दिया गया। यह मामला करीब 23.50 लाख रुपए के भुगतान से जुड़ा था। टेंडर निरस्तीकरण आदेश में भुगतान की गई राशि की वसूली का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया। सवाल यह है कि यदि ब्लैकलिस्टेड एजेंसी को भुगतान किया गया, तो सरकारी धन की वसूली किससे होगी? यह कार्य विभाग नहीं कर पा रहा।
अलवर जिला अस्पताल में कंप्यूटर ऑपरेटर व डेटा एंट्री कार्य के लगभग दो करोड़ रुपए के टेंडर में अनियमितता के आरोप लगे। एक फर्म ने निविदा में यह शपथ पत्र दिया कि वह किसी सरकारी विभाग में डिबार नहीं है, जबकि उसके डिबार होने के रिकॉर्ड पहले से उपलब्ध बताए गए। शिकायत के बाद संयुक्त निदेशक स्तर पर मामला पहुंचा और पीएमओ सहित संबंधित अधिकारियों से जवाब-तलब किया गया। यह मामला इसलिए गंभीर माना जा रहा है, क्योंकि यदि किसी फर्म ने गलत शपथ पत्र देकर पात्रता प्राप्त की, तो यह केवल टेंडर निरस्त करने का विषय नहीं, बल्कि कथित धोखाधड़ी का भी मामला बन सकता है। इसके बावजूद फर्म पर एक्शन नहीं लिया गया।