
अलवर। मोती नगर निवासी सेवानिवृत्त नायब सूबेदार ओमप्रकाश शर्मा ने करगिल युद्ध के दौरान टाइगर हिल पर तिरंगा फहराने वाले अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। ओमप्रकाश बताते हैं कि वे वर्ष 1991 में मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री रेजिमेंट सेंटर, अहमदनगर (महाराष्ट्र) से सेना में भर्ती हुए। वर्ष 1997 में उनकी तैनाती राष्ट्रीय राइफल्स के तहत जम्मू-कश्मीर के डोडा सेक्टर में हुई। करगिल युद्ध शुरू होने पर उन्हें बारामूला होते हुए टाइगर हिल क्षेत्र में भेजा गया, जहां 26 राष्ट्रीय राइफल्स और 10 महार रेजिमेंट की संयुक्त टुकड़ी ने अभियान में हिस्सा लिया।
युद्ध के दौरान उनके कैंप पर हमला हुआ, जिसमें कई साथी शहीद हो गए। एक रात दुश्मन का गोला उनकी पोस्ट के आगे आकर गिरा, जिसके बाद उन्होंने तत्काल कंपनी कमांडर को सूचना दी। पूरी यूनिट ने रातभर मोर्चा संभाला और जवाबी कार्रवाई में दुश्मन पर ताबड़तोड़ फायरिंग की। ओमप्रकाश बताते हैं कि युद्ध के दौरान हमें लगातार पांच दिनों तक भोजन-पानी नहीं मिला। भीषण ठंड के कारण शरीर पर छाले पड़ गए, लेकिन हौसला नहीं टूटा। नौ महीने तक परिवार से कोई संपर्क नहीं किया। करगिल विजय के बाद ही घर लौटकर परिजनों से मुलाकात हुई। ओमप्रकाश शर्मा 26 वर्ष की सैन्य सेवा के बाद 28 फरवरी 2017 को सेवानिवृत्त हुए।
अलवर शहर के 200 फीट रोड स्थित धन्ना का बाग निवासी सेवानिवृत्त सूबेदार धनेश चंद उस समय श्रीगंगानगर जिले के रायसिंहनगर-गजसिंहपुर क्षेत्र में भारत-पाक सीमा पर तैनात थे। सेना में भर्ती हुए उन्हें महज तीन वर्ष ही हुए थे और वे हवलदार के पद पर कार्यरत थे। जैसे ही कारगिल युद्ध शुरू हुआ, उनकी यूनिट को पश्चिमी सीमा की सुरक्षा की जिम्मेदारी मिली। आशंका थी कि पाकिस्तान किसी भी मोर्चे से हमला कर सकता है। ऐसे में रातों-रात बंकर बनाए गए, बारूदी सुरंगें बिछाई गईं और पूरी सीमा को सील कर चप्पे-चप्पे पर सैनिक तैनात कर दिए गए। उस समय मोबाइल फोन नहीं थे। सप्ताह में केवल एक बार कंट्रोल रूम के माध्यम से परिवार से बातचीत हो पाती थी। युद्ध शुरू होने के बाद परिजनों को सूचना देने का अवसर भी नहीं मिला। युद्ध समाप्त होने के बाद ही परिवार से संपर्क हो सका।
श्रीराम कॉलोनी, कटीघाटी निवासी सेवानिवृत्त हवलदार मुखराम यादव ने बताया कि करगिल युद्ध के समय वे हैदराबाद में चल रहे सैन्य प्रशिक्षण में शामिल थे। करगिल युद्ध की घोषणा होते ही उन्हें सियाचिन ग्लेशियर और चीन सीमा क्षेत्र में तैनाती के आदेश मिले। दुश्मन किसी भी दिशा से हमला कर सकता था, इसलिए जवानों को भी तुरंत सीमाओं पर भेजा गया। अत्यधिक ठंड और खराब मौसम के बीच हर दिन चुनौतीपूर्ण था, लेकिन देश सेवा का जज्बा कम नहीं हुआ।
ट्रांसपोर्ट नगर निवासी सेवानिवृत्त नायब सूबेदार अमरजीत सिंह करगिल युद्ध के दौरान सिग्नल कम्युनिकेशन विभाग में तैनात थे। पहली पोस्टिंग गोवा और फिर पश्चिम बंगाल में हुई। इसी दौरान मुख्यालय से आदेश मिला कि पूरी टुकड़ी को करगिल रवाना होना है। घर पर सूचना देने का भी समय नहीं मिला। अमरजीत का काम सेना की संचार व्यवस्था बनाए रखना था, ताकि अग्रिम मोर्चे पर तैनात जवानों तक हर जरूरी सूचना समय पर पहुंचती रहे। गोलाबारी और बमबारी के बीच यह काम अमरजीत सिंह ने पूरी निष्ठा के साथ किया।