
नई शिक्षा नीति (एनईपी) के तहत उच्च शिक्षा में बहुविषयक (मल्टी डिसिप्लिनरी) पढ़ाई को बढ़ावा देने की पहल सरकारी कॉलेजों के लिए चुनौती बन गई है। स्नातक प्रथम वर्ष में विद्यार्थियों के लिए दो वैकल्पिक विषयों में से एक विज्ञान विषय चुनना अनिवार्य कर दिया गया है। इसका सबसे अधिक असर कला संकाय (आर्ट्स) के विद्यार्थियों पर पड़ रहा है।
जिन्हें अब इतिहास, राजनीति विज्ञान और हिंदी के साथ फिजिक्स, केमिस्ट्री, प्राणी शास्त्र, वनस्पति शास्त्र जैसे विज्ञान विषय भी पढ़ने पड़ रहे हैं, लेकिन विडंबना यह है कि जिन कॉलेजों में इन विषयों को पढ़ाने के लिए प्रोफेसर ही नहीं हैं, वहां भी यह व्यवस्था लागू कर दी गई है।
कई कॉलेजों में विज्ञान संकाय नहीं है। ऐसे में विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए नजदीकी महाविद्यालयों से शिक्षकों को प्रतिदिन दो-दो घंटे के लिए बुलाया जा रहा है। इससे न तो नियमित कक्षाएं लग पा रही हैं और न ही विद्यार्थियों को विषय की गहराई से समझ मिल रही है। कला संकाय में हजारों की संख्या में हर साल विद्यार्थी प्रवेश लेते हैं। यह समस्या केवल अलवर में नहीं, बल्कि पूरे राजस्थान के विद्यार्थियों की है।
शहरी क्षेत्र के कॉलेज तो किसी तरह आसपास के साइंस कॉलेजों की मदद लेकर काम चला रहे हैं, लेकिन ब्लॉक स्तर के कॉलेजों में स्थिति अधिक गंभीर है। यहां स्थायी फैकल्टी का अभाव है और आसपास कोई ऐसा महाविद्यालय भी नहीं है, जहां से विषय विशेषज्ञ बुलाए जा सकें।
ऐसे में कई विद्यार्थियों को अपने स्तर पर पढ़ाई करके परीक्षा की तैयारी करनी पड़ रही है। पर्याप्त पढ़ाई नहीं होने से कई विद्यार्थी विज्ञान विषयों में सफल नहीं हो पा रहे हैं। इसके कारण उनके पेपर ड्यू (बैक) रह जाते हैं। अगली परीक्षाओं में दोबारा शुल्क जमा कर परीक्षा देनी पड़ती है, जिससे आर्थिक बोझ भी बढ़ रहा है।
विद्यार्थियों का कहना है कि उन्होंने कला संकाय अपनी रुचि के आधार पर चुना था, लेकिन अब अनिवार्य रूप से विज्ञान विषय पढ़ने से अतिरिक्त दबाव बढ़ गया है। प्रयोगात्मक विषयों की बुनियादी जानकारी नहीं होने से कोर्स को समझना और परीक्षा की तैयारी करना, दोनों चुनौती बन गई हैं।
नई शिक्षा नीति का उद्देश्य विद्यार्थियों को बहुआयामी ज्ञान देना है, लेकिन इसके सफल क्रियान्वयन के लिए पहले पर्याप्त फैकल्टी, प्रयोगशालाएं और अन्य शैक्षणिक संसाधन उपलब्ध कराना जरूरी है। जब तक रिक्त पद नहीं भरते और प्रत्येक महाविद्यालय में विषय विशेषज्ञों की नियुक्ति नहीं होती, तब तक मल्टीपल सब्जेक्ट व्यवस्था का लाभ कागजों तक ही सीमित रहने का खतरा बना रहेगा। इसके लिए बहु-संकाय महाविद्यालय होने आवश्यक है - प्रो. रामानंद यादव, अध्यक्ष, साइंटिस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया