
अयोध्याराम मंदिर में दानपात्र से धनराशि की कथित चोरी का मामला सामने आने के बाद कई ऐसे नाम चर्चा में आ गए हैं, जो ट्रस्ट के आधिकारिक पदाधिकारी नहीं हैं, लेकिन मंदिर की व्यवस्थाओं और संचालन में उनकी भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इनमें सबसे प्रमुख नाम निर्माण सहायक गोपाल राव का है।
सूत्रों के अनुसार, कर्नाटक निवासी गोपाल राव का श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में कोई प्रशासनिक या पदाधिकारी स्तर का पद नहीं है, लेकिन मंदिर निर्माण से लेकर व्यवस्थाओं और वीवीआईपी दर्शन प्रणाली तक उनकी मजबूत पकड़ बताई जाती रही है। दानराशि चोरी के मामले के सामने आने के बाद से गोपाल राव सार्वजनिक रूप से नजर नहीं आए हैं, जिससे चर्चाओं का बाजार और गर्म हो गया है।
मंदिर परिसर में वीवीआईपी दर्शन के लिए पास जारी करने की एक निर्धारित व्यवस्था है। सामान्य तौर पर यह अधिकार ट्रस्ट के कुछ चुनिंदा पदाधिकारियों और प्रशासनिक अधिकारियों को ही प्राप्त है। इनमें ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय, ट्रस्टी अनिल मिश्रा, जिलाधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, डीआईजी और एसपी सुरक्षा जैसे अधिकारी शामिल हैं।
हालांकि सूत्रों का दावा है कि गोपाल राव भी अपने नाम से वीवीआईपी पास जारी करते रहे हैं। सवाल यह उठ रहा है कि यदि उनके पास कोई आधिकारिक प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं थी, तो उन्हें यह अधिकार किस आधार पर मिला और इसकी निगरानी कौन करता था।
मामले में गोपाल राव के एक करीबी रिश्तेदार का नाम भी सामने आ रहा है। सूत्रों के मुताबिक, यह रिश्तेदार मंदिर की विभिन्न व्यवस्थाओं में सक्रिय भूमिका निभाता था और कथित तौर पर गोपाल राव की आईडी का उपयोग कर वीवीआईपी दर्शन की बुकिंग भी करता था।
बताया जा रहा है कि नाम गोपाल राव का इस्तेमाल होता था, जबकि कई बार व्यवस्थाओं का संचालन उनका रिश्तेदार करता था। हालांकि इन दावों की अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
राम मंदिर निर्माण के दौरान गोपाल राव की भूमिका काफी महत्वपूर्ण मानी जाती रही है। मंदिर निर्माण में उपयोग होने वाले पत्थरों की खरीद, सामग्री की उपलब्धता और निर्माण संबंधी कई तकनीकी प्रक्रियाओं में उनकी भागीदारी बताई जाती है।
सूत्रों के अनुसार, निर्माण कार्य के दौरान वह कई अहम निर्णयों से जुड़े रहे और मंदिर परिसर में होने वाली गतिविधियों की जानकारी भी उनके पास रहती थी। यही वजह है कि दानराशि विवाद के बाद उनकी भूमिका को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।
सूत्रों का दावा है कि मंदिर परिसर में कुछ ऐसे लोग भी सक्रिय थे, जो न तो ट्रस्ट के आधिकारिक पदाधिकारी थे और न ही प्रशासनिक अधिकारी, लेकिन वे वॉकी-टॉकी लेकर व्यवस्थाओं में हस्तक्षेप करते दिखाई देते थे।
इनमें टिन्नू नामक व्यक्ति का भी जिक्र किया जा रहा है। बताया जाता है कि वह वीवीआईपी दर्शन व्यवस्था में प्रभावशाली भूमिका निभाता था और कई बार बिना औपचारिक प्रक्रिया के भी लोगों को दर्शन कराने का दावा करता था।
इसके अलावा गोपाल राव के रिश्तेदार और ट्रस्ट से जुड़े कुछ अन्य करीबी लोगों के भी व्यवस्थाओं में सक्रिय रहने की चर्चा है। अब दानराशि विवाद के बाद इन सभी भूमिकाओं और अधिकारों की जांच की मांग तेज हो गई है।
दानराशि चोरी के मामले की जांच के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि मंदिर परिसर में कौन-कौन लोग वास्तविक अधिकारों के साथ काम कर रहे थे और कौन लोग अनौपचारिक रूप से व्यवस्थाओं पर प्रभाव रखते थे।
जांच एजेंसियां और संबंधित अधिकारी अब उन व्यवस्थागत खामियों को भी खंगाल रहे हैं, जिनकी वजह से कथित तौर पर कुछ व्यक्तियों का प्रभाव उनके आधिकारिक दायरे से कहीं अधिक बढ़ गया था।