
Ayodhya Ram Mandir Donation Dispute Case: श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से जुड़े कथित चढ़ावा चोरी मामले को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। इस बीच निर्मोही अखाड़े की ओर से सुप्रीम कोर्ट (SC) में दायर याचिका ने संत समाज के भीतर भी अलग-अलग राय सामने ला दी है। एक ओर कुछ संत ट्रस्ट के पुनर्गठन और फॉरेंसिक ऑडिट की मांग का समर्थन कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ संतों का कहना है कि पूरे ट्रस्ट को कठघरे में खड़ा करना उचित नहीं है।
निर्मोही अखाड़े ने सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में ट्रस्ट के आय-व्यय का फॉरेंसिक ऑडिट कराने, ट्रस्ट को सार्वजनिक ट्रस्ट के रूप में पुनर्गठित करने और रामानंदी परंपरा के अनुरूप पूजा-पाठ की व्यवस्था बहाल करने की मांग की है। इस याचिका पर सोमवार को सुनवाई प्रस्तावित है।
महामंडलेश्वर विष्णुदास ने निर्मोही अखाड़े की मांग का समर्थन करते हुए कहा कि राम मंदिर के चढ़ावे में कथित अनियमितताओं का मामला करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा है। उनके अनुसार, इस तरह की घटनाओं से भक्तों का विश्वास प्रभावित हुआ है और इसीलिए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
उन्होंने कहा कि मौजूदा ट्रस्ट को भंग कर नई व्यवस्था बनाई जानी चाहिए, जिससे भविष्य में इस तरह के विवाद दोबारा सामने ना आएं। उनका कहना था कि निर्मोही अखाड़े की याचिका का उद्देश्य व्यवस्था में पारदर्शिता लाना और श्रद्धालुओं का भरोसा कायम रखना है।
वहीं, साकेत भवन के महंत सीताराम दास ने निर्मोही अखाड़े की मांग पर असहमति जताई। उन्होंने कहा कि यदि किसी कर्मचारी या व्यक्ति से कोई गलती हुई है तो उसकी जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए, लेकिन इसके आधार पर पूरे ट्रस्ट को समाप्त करने की मांग उचित नहीं कही जा सकती।
उन्होंने कहा कि ट्रस्ट के सभी पदाधिकारियों पर एक साथ आरोप लगाना सही नहीं है। अगर जांच में किसी अधिकारी या पदाधिकारी की लापरवाही सामने आती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन पूरी संस्था को कटघरे में खड़ा करना न्यायसंगत नहीं होगा।
महंत सीताराम दास ने कहा कि देश कानून और संविधान के अनुसार चलता है। उनके मुताबिक, हर विवाद को सीधे सुप्रीम कोर्ट तक ले जाना उचित परंपरा नहीं है। उन्होंने कहा कि न्यायालयों के सामने पहले से ही कई महत्वपूर्ण मामले लंबित हैं, इसलिए हर मुद्दे का समाधान न्यायिक हस्तक्षेप से ही हो, यह जरूरी नहीं है।
सीताराम दास ने कहा कि सनातन धर्म और मंदिरों से जुड़े विषय अत्यंत संवेदनशील हैं। ऐसे मामलों में संत समाज को आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर एकजुट होकर काम करना चाहिए। उनका मानना है कि छोटे-छोटे विवादों को सार्वजनिक रूप से उछालने से सनातन समाज की छवि प्रभावित हो सकती है और इससे श्रद्धालुओं के बीच भ्रम की स्थिति पैदा होती है।
निर्मोही अखाड़े की याचिका के बाद अब इस पूरे मामले पर सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत के समक्ष ट्रस्ट के फॉरेंसिक ऑडिट, पुनर्गठन और पूजा-पद्धति से जुड़े मुद्दों पर क्या रुख अपनाया जाता है, यह आने वाले समय में इस विवाद की दिशा तय कर सकता है। फिलहाल, इस मुद्दे पर संत समाज के भीतर समर्थन और विरोध—दोनों स्वर साफ तौर पर देखने को मिल रहे हैं।