
Kargil Vijay Diwas 2026: 26 जुलाई 1999 का दिन भारत के इतिहास में शौर्य, साहस और बलिदान का प्रतीक बनकर दर्ज है। करीब 60 दिनों तक चले कारगिल युद्ध में भारतीय सेना ने अदम्य पराक्रम का परिचय देते हुए पाकिस्तान के घुसपैठियों को कारगिल की दुर्गम चोटियों से खदेड़कर ऑपरेशन विजय को सफल बनाया था। इसी ऐतिहासिक जीत की याद में हर वर्ष 26 जुलाई को पूरे देश में कारगिल विजय दिवस मनाया जाता है।
इस गौरवपूर्ण विजय में छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के जवानों का भी अहम योगदान रहा। किसी ने सीमा पर दुश्मनों से सीधी लड़ाई लड़ी तो किसी ने युद्धभूमि में घायल सैनिकों का उपचार कर उनकी जान बचाई। वहीं जिले का एक जवान युद्ध की तैयारी के दौरान देश के लिए शहीद भी हो गया।
बालोद जिले के ग्राम झीकाटोला निवासी रिटायर्ड हवलदार कोमल सिंह मंडावी कारगिल युद्ध के प्रत्यक्षदर्शी रहे हैं। वर्ष 1986 में भारतीय सेना में भर्ती हुए मंडावी उस समय बिहार रेजिमेंट में हवलदार के पद पर द्रास सेक्टर में तैनात थे। कारगिल युद्ध को याद करते हुए उन्होंने बताया कि युद्ध शुरू होने से करीब तीन दिन पहले ही उन्हें कुछ असामान्य गतिविधियों का आभास होने लगा था।
उन्होंने बताया कि उनके कैंप के पास स्थित 'दाह' गांव के चरवाहे रोजाना अपने मवेशियों को पहाड़ियों पर चराने ले जाते थे, लेकिन कई दिनों से मवेशी वापस नहीं लौट रहे थे। इस बात की जानकारी चरवाहे ने सेना को दी। सूचना मिलते ही अधिकारियों ने गश्ती दल को इलाके की जांच के लिए भेजा। जब जवान ऊंची पहाड़ियों तक पहुंचे तो वहां पाकिस्तानी सेना और घुसपैठिए पहले से ही मोर्चा संभाले बैठे मिले। इसके बाद भारतीय सेना ने बड़े स्तर पर ऑपरेशन शुरू किया और 60 दिनों तक चले भीषण युद्ध के बाद दुश्मनों को खदेड़कर कारगिल की चोटियों पर दोबारा तिरंगा फहराया।
कोमल सिंह मंडावी बताते हैं कि कारगिल युद्ध सामान्य युद्धों से बिल्कुल अलग था। दुश्मन ऊंची पहाड़ियों पर बैठा था, जबकि भारतीय सैनिकों को नीचे से चढ़ाई करते हुए आगे बढ़ना पड़ता था। बेहद कम तापमान, बर्फीली हवाएं और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद भारतीय जवानों ने अदम्य साहस का परिचय दिया। हर कदम पर मौत का खतरा था, लेकिन देश की रक्षा का संकल्प सबसे बड़ा था।
कारगिल युद्ध के एक और गवाह बालोद निवासी थानेश्वर प्रसाद साहू हैं। वर्ष 1995 में सेना में भर्ती हुए थानेश्वर प्रसाद साहू की तैनाती मेडिकल कोर में थी। युद्ध के दौरान उनकी जिम्मेदारी घायल जवानों का प्राथमिक उपचार करना और उन्हें सुरक्षित आगे की चिकित्सा के लिए भेजना था।
उन्होंने बताया कि युद्ध के दौरान प्रतिदिन बड़ी संख्या में घायल सैनिक मेडिकल कैंप पहुंचते थे। कई जवान गंभीर रूप से घायल होते थे, लेकिन इलाज के बाद वे फिर से मोर्चे पर लौटने की जिद करते थे। कई बार हालात ऐसे बन जाते थे कि घायलों की संख्या इतनी अधिक होती थी कि उपलब्ध स्ट्रेचर कम पड़ जाते थे। ऐसी स्थिति में लकड़ी, बांस और कंबल की मदद से अस्थायी स्ट्रेचर तैयार किए जाते थे और उन्हीं के सहारे घायल जवानों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया जाता था।
थानेश्वर बताते हैं कि युद्ध के वे दृश्य आज भी उनकी आंखों के सामने ताजा हैं। घायल सैनिकों की पीड़ा, साथियों का हौसला और देश के लिए सब कुछ न्योछावर करने का जज्बा कभी भुलाया नहीं जा सकता। उन दिनों को याद करते ही आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
कारगिल युद्ध में देशभर के हजारों सैनिकों ने अपनी बहादुरी का परिचय दिया था। बालोद जिले के जवानों ने भी अपने साहस, समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा से इस ऐतिहासिक विजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। किसी ने मोर्चे पर दुश्मन से मुकाबला किया तो किसी ने घायल साथियों की जान बचाने में दिन-रात एक कर दिया। वहीं जिले के एक जवान ने युद्ध की तैयारियों के दौरान सर्वोच्च बलिदान देकर मातृभूमि के प्रति अपनी निष्ठा साबित की।
26 जुलाई को पूरे देश में कारगिल विजय दिवस के रूप में शहीदों और वीर सैनिकों को श्रद्धांजलि दी जाती है। यह दिन उन बहादुर जवानों के अदम्य साहस, बलिदान और देशभक्ति की याद दिलाता है, जिनकी बदौलत भारत ने दुनिया के सबसे कठिन युद्ध अभियानों में से एक में ऐतिहासिक जीत हासिल की। कारगिल के रणबांकुरों की यह वीरगाथा आने वाली पीढ़ियों को हमेशा देशभक्ति और राष्ट्रसेवा के लिए प्रेरित करती रहेगी।