शिक्षाविदों का मानना है कि यदि एआइ Artificial Intelligence का उपयोग केवल सहायक उपकरण के रूप तक सीमित न रखा गया, तो शोध की गुणवत्ता में गिरावट आना तय है। इसलिए आवश्यक है कि विश्वविद्यालय एआइ के उपयोग पर स्पष्ट दिशा-निर्देश तय करें और छात्रों को जिम्मेदार तथा नैतिक उपयोग के लिए जागरूक करें।
क्षेत्र कोई भी हो, एआइ (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) की निर्भरता बढ़ती जा रही है। कॉलेजों में शोध पत्रों और थीसिस में भी एआइ के अत्यधिक उपयोग से शैक्षणिक गुणवत्ता और शोध की विश्वसनीयता पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पडऩे लगा है। सबसे बड़ा नुकसान शोध की मौलिकता का हो रहा है। एआइ से तैयार सामग्री अक्सर पहले से उपलब्ध सूचनाओं का पुनरुत्पादन होती है, जिससे नए विचार, विश्लेषण और नवाचार की कमी रह जाती है। इससे शोध का मूल उद्देश्य ही कमजोर होता जा रहा है।
दूसरी ओर अकादमिक ईमानदारी पर सवाल खड़े होने लगे हैं। बिना उचित संदर्भ या खुलासे के एआइ-जनित सामग्री का उपयोग प्लेगरिज्म Plagiarism के समान माना जा रहा है। इससे छात्रों और संस्थानों की साख प्रभावित होती है। एआइ पर अत्यधिक निर्भरता से छात्रों की आलोचनात्मक सोच, लेखन क्षमता और विश्लेषणात्मक कौशल का विकास बाधित होता है।
शिक्षाविदों का मानना है कि यदि एआइ Artificial Intelligence का उपयोग केवल सहायक उपकरण के रूप तक सीमित न रखा गया, तो शोध की गुणवत्ता में गिरावट आना तय है। इसलिए आवश्यक है कि विश्वविद्यालय एआइ के उपयोग पर स्पष्ट दिशा-निर्देश तय करें और छात्रों को जिम्मेदार तथा नैतिक उपयोग के लिए जागरूक करें।
इसी दिशा में कदम बढ़ाते हुए कर्नाटक के विश्वेश्वरैया प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (वीटीयू) ने शोध की मौलिकता और अकादमिक ईमानदारी बनाए रखने का निर्णय लिया है। वीटीयू ने सभी इंजीनियरिंग कॉलेजों के लिए शोध पत्रों और पीएचडी थीसिस में एआइ से तैयार सामग्री के उपयोग पर सख्त नियंत्रण लगाते हुए इसकी अधिकतम सीमा 20 प्रतिशत निर्धारित कर दी है। वीटीयू का यह निर्णय देश के कई उच्च शिक्षण संस्थानों की उस नीति के अनुरूप है, जिनमें एआइ कंटेंट पर सीमा निर्धारित की गई है।
वीटीयू Visvesvaraya Technological University के कुलसचिव (मूल्यांकन) उज्ज्वल यू. जे. ने बताया कि एआइ का उपयोग सही दिशा में होना चाहिए, लेकिन इसका दुरुपयोग हो रहा है। वीटीयू के जांच में कुछ मामलों में थीसिस और शोध पत्रों में एआइ जनित सामग्री 60 प्रतिशत तक निकली। हर सप्ताह 70 प्रतिशत से अधिक एआइ कंटेंट वाले कम-से-कम 15 शोध पत्र सामने आ रहे हैं। अब यदि एआइ कंटेंट 20 प्रतिशत से अधिक पाया गया तो थीसिस को जांच (वेटिंग) के लिए भेजा जाएगा या सीधे अस्वीकार कर दिया जाएगा।
कुलसचिव ने कहा कि थीसिस को प्लेगरिज्म जांच के लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर अपलोड करना अनिवार्य होगा। सभी प्राचार्यों, शोध मार्गदर्शकों और शोधार्थियों को निर्देश दिया है कि वे मौजूदा प्रक्रिया के तहत ड्रिलबिट प्लेटफॉर्म पर थीसिस की सॉफ्ट कॉपी अपलोड करें।
एआइ के नाम पर हो रही नकल शोध की मौलिकता, अकादमिक ईमानदारी और शोध नैतिकता पर प्रश्नचिह्न लगाती है। हाल के दिनों में कुछ पीएचडी छात्र ‘स्मार्ट वर्क’ के बहाने प्लेगरिज्म में लिप्त पाए गए हैं। इसे रोकने के लिए सॉफ्टवेयर के माध्यम से कड़ी जांच की जा रही है और एआइ के उपयोग को लेकर स्पष्ट चेतावनी दी गई है।
-डॉ. एस. विद्याशंकर, कुलपति, वीटीयू