
Bharatpur Apna Ghar Ashram: राजस्थान के भरतपुर में स्थित ‘अपना घर आश्रम’ में गुरुवार का दिन एक अद्भुत और भावुक क्षण का साक्षी बना। यह दिन दो परिवारों के जीवन में बरसों से छाए अंधेरे को मिटाकर जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी लेकर आया। मानसिक अस्वस्थता और विपरीत परिस्थितियों के कारण वर्षों पहले अपने-अपने घरों से बिछड़ चुके दो प्रभुजन (आश्रम में बेसहारा लोगों को दिया गया सम्मानजनक नाम) आखिरकार अपने परिजनों से दोबारा मिल गए।
बता दें कि इस पुनर्मिलन में जहां एक परिवार ने पूरे 14 साल बाद अपने बेटे, पति और भाई को जीवित देखा। वहीं, दूसरे परिवार का 20 वर्षों से चला आ रहा लंबा इंतजार हमेशा के लिए खत्म हो गया। आश्रम परिसर में जब ये दोनों परिवार अपने बिछड़े हुए अपनों से गले मिले, तो वहां मौजूद हर एक व्यक्ति की आंखें नम हो गईं।
पहला मामला उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर का है। यहां के निवासी विक्रम (टिंकू) लगभग 14 वर्ष पहले गंभीर मानसिक अस्वस्थता के कारण अचानक अपने घर से लापता हो गए थे। उस समय उनका इलाज पूरा नहीं हो पाया था और परिजनों से उनका संपर्क पूरी तरह टूट गया। विक्रम के अचानक चले जाने से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। परिजनों ने स्थानीय थाने में गुमशुदगी दर्ज कराई, हर रिश्तेदार के घर दस्तक दी और कई शहरों में उनकी तलाश की, लेकिन कोई सुराग हाथ नहीं लगा।
समय बीतने के साथ परिवार ने भारी मन से उन्हें मृत मान लिया था। विक्रम के जाने के बाद उनकी पत्नी निर्मला पर बच्चों की जिम्मेदारी आ गई। निर्मला ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने मजदूरी और छोटे-मोटे काम कर कठिन परिस्थितियों में अपने बच्चों का पालन-पोषण किया। संघर्षों के बीच परिवार को तो उन्होंने संभाल लिया, लेकिन पति के वापस लौटने की आखिरी उम्मीद भी समय के साथ खत्म हो चुकी थी।
इसी बीच, दिल्ली में ‘अपना घर आश्रम’ की रेस्क्यू टीम को विक्रम बस स्टैंड पर गंभीर रूप से बीमार, अत्यधिक कुपोषित और लाचार हालत में मिले। वे क्षय रोग (से भी पीड़ित थे और चलने-फिरने में भी पूरी तरह असमर्थ थे। रेस्क्यू टीम ने उन्हें प्राथमिक उपचार दिया और फिर बेहतर देखभाल के लिए भरतपुर स्थित अपना घर आश्रम लेकर आए।
आश्रम में लंबे समय तक चले इलाज, निरंतर देखभाल और आत्मीय स्नेह के कारण विक्रम की मानसिक और शारीरिक स्थिति में धीरे-धीरे सुधार होने लगा। याददाश्त वापस आने पर उन्होंने अपने गांव और परिवार के बारे में जानकारी दी। इसके बाद आश्रम की पुनर्वास टीम ने तुरंत सक्रियता दिखाई और उनके गांव के प्रधान के माध्यम से उनके भाई तक सूचना पहुंचाई।
शुरुआत में परिवार को इस बात पर बिल्कुल विश्वास नहीं हुआ कि 14 साल बाद विक्रम जीवित हो सकते हैं। लेकिन जब वीडियो कॉल के जरिए परिजनों ने विक्रम को देखा और उनसे बात की, तो पूरा परिवार भावुक हो उठा। अगले ही दिन पत्नी निर्मला, विक्रम के भाई और अन्य परिजन भरतपुर पहुंच गए। वर्षों बाद जब पति-पत्नी का मिलन हुआ, तो आश्रम का पूरा माहौल भावनाओं से भर गया।
नम आंखों और रुंधे गले से निर्मला ने कहा, मैंने तो उम्मीद ही छोड़ दी थी, लगा था कि अब ये इस दुनिया में नहीं हैं। अपना घर आश्रम ने मेरा सुहाग मुझे वापस लौटा दिया। अब मुझे जीवन में और कुछ नहीं चाहिए।
दूसरा भावुक पुनर्मिलन मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा निवासी राजू का था। राजू भी लगभग 20 वर्ष पहले अपने घर से बिना किसी को बताए कहीं निकल गए थे। वर्षों तक भटकने के बाद, वर्ष 2019 में उन्हें गुजरात के सूरत से रेस्क्यू करके अपना घर आश्रम भरतपुर लाया गया था।
आश्रम में कई सालों तक चले उपचार और पुनर्वास प्रयासों के बाद राजू की याददाश्त में सुधार आया। स्वस्थ होने पर उन्होंने अपने गांव और परिजनों के नाम आश्रम की टीम को बताए। पुनर्वास टीम ने बिना देर किए उनके भाई गोपी और अन्य रिश्तेदारों तक सूचना भेजी।
खबर मिलते ही जब परिजन भरतपुर आश्रम पहुंचे, तो 20 वर्षों के लंबे समयांतराल के कारण पहली नजर में कोई भी एक-दूसरे को पहचान नहीं पाया। स्थिति को स्पष्ट करने के लिए राजू ने खुद अपने भाई-बहनों और रिश्तेदारों के नाम पुकारे और बचपन की बातें बताईं। इसके बाद परिजनों ने भी पारिवारिक संबंधों और पुरानी बातों की पुष्टि की। पहचान पक्की होते ही 20 साल का बिछड़ाव और दर्द खुशी के आंसुओं में बह गया। औपचारिकताएं पूरी करने के बाद परिवार राजू को सम्मान के साथ अपने घर छिंदवाड़ा ले गया।
इन दोनों परिवारों ने अपना घर आश्रम की निस्वार्थ सेवा, बेहतरीन चिकित्सा व्यवस्था और पुनर्वास प्रयासों की दिल से सराहना की और इसे समाज के लिए मानवता की एक जीवित मिसाल बताया। राजू के चचेरे भाई विद्यानंद ने कहा, उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि कोई संस्था सड़क पर बेसहारा पड़े लोगों को इस तरह परिवार की तरह अपना सकती है, उनका इलाज कर सकती है और उन्हें दोबारा अपनों से मिला सकती है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि निस्वार्थ सेवा करने वाले ऐसे आश्रम देश के हर शहर में होने चाहिए, ताकि कोई भी बिछड़ा हुआ व्यक्ति अपने घर से दूर न रहे।