
नदबई (भरतपुर): वक्त ने पहले इकलौते भाई को छीना और अब पिता के बिछड़ने का दुख दे दिया। परिवार पर दुखों का पहाड़ था, लेकिन इस कठिन घड़ी में तीनों बेटियां मजबूती से खड़ी रहीं। पिता की अंतिम यात्रा में उन्होंने न केवल अर्थी को कंधा दिया, बल्कि मुखाग्नि देकर अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी भी निभाई। यह दृश्य देखकर वहां मौजूद लोगों की आंखें नम हो गईं।
नदबई क्षेत्र के गांव ऊंच निवासी आर्मी से सेवानिवृत्त कैप्टन रणधीर सिंह चाहर का बीमारी के चलते निधन हो गया। उन्होंने लंबे समय तक भारतीय सेना में रहकर देश की सेवा की थी। सेवानिवृत्ति के बाद वे परिवार के साथ जीवन बिता रहे थे। परिवार में एक बेटा नवीन और तीन बेटियां थीं, लेकिन कोरोना काल में इकलौते बेटे नवीन का निधन हो गया। बेटे को खोने का दर्द परिवार अभी भुला भी नहीं पाया था कि पिता के निधन से एक बार फिर घर में शोक छा गया।
ऐसे समय में तीनों बेटियों ने हिम्मत दिखाई। पिता के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी अपने हाथों में लेते हुए उन्होंने अर्थी को कंधा दिया और मुखाग्नि देकर उन्हें अंतिम विदाई दी। पिता के जाने का गम उनके चेहरों पर साफ झलक रहा था, लेकिन अपने कर्तव्य को निभाने के संकल्प में वे पीछे नहीं हटीं। परिवार की तीन बेटियों में से दो शिक्षा विभाग में कार्यरत हैं, जबकि तीसरी गृहिणी हैं। भाई के निधन के बाद परिवार के लिए बेटियों का साथ और भी अहम हो गया था। अब पिता की अंतिम विदाई के समय भी वे ही परिवार का संबल बनीं।
गांव में इस भावुक दृश्य की चर्चा रही। बेटियों ने अपने कर्म से यह संदेश दिया कि माता-पिता के प्रति प्रेम, जिम्मेदारी और कर्तव्य किसी रिश्ते या बेटे-बेटी के भेद के मोहताज नहीं होते। देश की सेवा करने वाले पिता को उनकी बेटियों ने अंतिम विदाई देकर अपने प्रेम और समर्पण की ऐसी मिसाल पेश की, जिसे गांव के लोग लंबे समय तक याद रखेंगे।
समृद्ध भारत अभियान के संयोजक सीताराम गुप्ता बताते हैं कि बदलते दौर में बेटियां हर क्षेत्र में अपनी काबिलियत साबित कर रही हैं। शिक्षा, रोजगार से लेकर परिवार की जिम्मेदारियों तक वे बेटों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही हैं। कानून ने भी बेटियों को समान अधिकार दिए हैं। हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के तहत बेटियों को पैतृक संपत्ति में बेटों के समान अधिकार प्राप्त हैं। वहीं, माता-पिता की सेवा, देखभाल और अंतिम संस्कार जैसी जिम्मेदारियों में भी बेटियां आगे आकर सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ रही हैं। भरतपुर जिले में बेटियों की ओर से पिता को कंधा देने और मुखाग्नि देने की घटनाएं इसी बदलती सोच की गवाह हैं। ये उदाहरण बताते हैं कि संतान का कर्तव्य निभाने के लिए बेटा होना जरूरी नहीं, बल्कि संवेदना, साहस और जिम्मेदारी का भाव होना जरूरी है।
हकीकत यह है कि अब समाज की सोच में बदलाव के साथ बेटियों को समान अधिकार मिलने से उनका वर्चस्व भी बढ़ा है। इससे पहले भी जिले में बेटियों ने नजीर पेश की है। उन्होंने सफलता के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है तो माता-पिता की जिम्मेदारी निभाने में भी पीछे नहीं रही हैं। 16 मार्च 2019 को कृष्णा नगर कॉलोनी निवासी राकेश की अर्थी को उनकी दो बेटियों ने कंधा दिया, क्योंकि मृतक का कोई पुत्र नहीं था। पांच वर्ष पहले भरतपुर के इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड में काम करने वाले प्रेम शंकर शर्मा को उनकी बेटियों ने कंधा देकर पिता को श्मशान तक पहुंचाया। उनका भी कोई बेटा नहीं था।