
Tarush Sharma Bharatpur Cricket: भरतपुर: क्रिकेट में बड़े-बड़े बल्लेबाज बनने से पहले खिलाड़ी हजारों गेंदों का सामना करते हैं। लेकिन भरतपुर का छह वर्षीय तारुष शर्मा इस मायने में सबसे अलग है। उम्र अभी यूकेजी की किताबें पढ़ने की है, लेकिन बल्ला ऐसा चलता है कि नेट पर बड़े खिलाड़ी भी हैरान रह जाते हैं। उसके दिन की शुरुआत क्रिकेट से होती है और अंत भी क्रिकेट पर ही। रोज करीब 1100 गेंदें खेलना, अंडर-19 खिलाडियों के साथ नेट अभ्यास और 40 मीटर लंबे छक्के जडना इस नन्हे बल्लेबाज की रोजमर्रा की कहानी है। यही वजह है कि भरतपुर के क्रिकेट गलियारों में इन दिनों एक ही नाम सबसे ज्यादा गूंज रहा है 'तारुष शर्मा'।
महज छह वर्ष की उम्र में तारुष ने जिस तरह क्रिकेट को अपनी जिंदगी बना लिया है, वह किसी अजूबे से कम नहीं है। यदि उसे रात के तीन बजे भी क्रिकेट खेलने के लिए जगा दिया जाए तो वह बिना किसी आलस के बल्ला उठाने को तैयार हो जाता है। उसकी ऊर्जा और खेल के प्रति दीवानगी देखकर हर कोई दंग रह जाता है। तारुष के पिता कृष्णकांत शर्मा जो मूल रूप से बंध बारैठा के निवासी हैं और वर्तमान में भरतपुर के जैन मंदिर क्षेत्र में रहते हैं।
बताते हैं कि क्रिकेट उनके परिवार की रगों में है। तारुष के मामा अच्छे क्रिकेटर हैं और स्वयं उन्हें भी क्रिकेट से गहरा लगाव रहा है। वे बताते हैं कि जिस दिन तारुष का जन्म हुआ, उसी दिन उन्होंने मन में ठान लिया था कि बेटे को क्रिकेटर बनाएंगे। समय के साथ जिम्मेदारियों के कारण यह सपना धुंधला पड़ गया, लेकिन एक दिन गोवर्धन परिक्रमा के दौरान रास्ते में पड़ी क्रिकेट अकादमी देखकर तारुष ने मासूमियत से कहा कि एक दिन मुझे यहां खेलना है। बस, उसी दिन पिता ने बेटे के सपने को अपना लक्ष्य बना लिया।
तारुष की क्रिकेट के प्रति दीवानगी तब और बढ़ गई, जब वह तीन साल की उम्र में अपने पिता के साथ जयपुर में आईपीएल मुकाबला देखने गया। उस दौरान भारतीय कप्तान रहे रोहित शर्मा बाउंड्री लाइन पर फील्डिंग कर रहे थे। तारुष ने पिता से कहा कि वह रोहित शर्मा से मिलना चाहता है, क्योंकि तारुष को रोहित शर्मा जैसा क्रिकेटर बनना है।
इस पर पिता ने जवाब दिया कि मैदान के अंदर खिलाड़ी बनकर ही उनसे मुलाकात हो सकती है। यही एक वाक्य तारुष के जीवन का टर्निंग प्वाइंट बन गया। उस दिन के बाद क्रिकेट उसके लिए खेल नहीं, बल्कि जुनून बन गया। आज स्थिति यह है कि दोपहर करीब डेढ़ बजे वह मैदान पहुंच जाता है और रात आठ बजे तक लगातार अभ्यास करता है। सुबह भी दो घंटे नेट पर पसीना बहाता है। मैदान में बारिश या पानी भर जाने जैसी परिस्थितियां भी उसके अभ्यास को नहीं रोक पातीं। उसके लिए हर दिन केवल क्रिकेट का दिन होता है।
तारुष की मेहनत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह प्रतिदिन करीब 1100 गेंदों का सामना करता है। उसके पिता स्वयं घंटों नेट पर गेंदबाजी कर उसे अभ्यास कराते हैं। इसी निरंतर अभ्यास का नतीजा है कि छह साल की उम्र में वह 40 मीटर तक छक्के लगाने की क्षमता रखता है। उसकी टाइमिंग, फुटवर्क और शॉट चयन देखकर कोच और वरिष्ठ खिलाड़ी भी उसकी खुलकर सराहना करते हैं।
हैरान करने वाली बात यह है कि तारुष अपनी उम्र के बच्चों के साथ नहीं, बल्कि अंडर-19 खिलाडियों के साथ नेट प्रैक्टिस करता है। तेज गेंदबाजों की गेंदों को आत्मविश्वास के साथ खेलना उसकी खासियत बन चुकी है। लगातार अभ्यास के दौरान उसके बल्ले भी उसकी ताकत के आगे जवाब दे चुके हैं। अब तक वह 13 बल्ले तोड़ चुका है। यही कारण है कि वह अपनी क्रिकेट अकादमी का सबसे चहेता खिलाड़ी बन गया है।
तारुष केवल बल्लेबाज ही नहीं, बल्कि एक प्रतिभाशाली गेंदबाज भी है। वह बाएं हाथ से बल्लेबाजी करता है, लेकिन गेंदबाजी दोनों हाथों से कर सकता है। इतनी कम उम्र में उसकी यह क्षमता क्रिकेट विशेषज्ञों के लिए भी कौतूहल का विषय बनी हुई है। नन्ही उम्र होने के कारण उसके आकार के बल्ले, ग्लव्स और अन्य क्रिकेट उपकरण स्थानीय बाजार में आसानी से उपलब्ध नहीं होते। परिवार को उसके लिए विशेष रूप से दूसरे शहरों से सामान मंगवाना पड़ता है। उसकी मां राजकीय विद्यालय में शिक्षिका हैं, व्यस्त दिनचर्या के बावजूद उसके खान-पान का विशेष ध्यान रखती हैं। तारुष को फास्ट फूड का कोई शौक नहीं है। दूध, दही और छाछ उसकी पसंदीदा चीजें हैं।
तारुष की दुनिया केवल बल्ला, गेंद और क्रिकेट का मैदान है। क्रिकेट प्रतिभा अभी अपने सफर की शुरुआती पिच पर है, लेकिन उसके शॉट, समर्पण और अनुशासन संकेत दे रहे हैं कि यदि यही मेहनत जारी रही तो आने वाले वर्षों में यह बाल बल्लेबाज केवल स्थानीय मैदानों में नहीं, बल्कि देश और दुनिया के बड़े क्रिकेट स्टेडियमों में भी अपनी बल्लेबाजी का जलवा बिखेरता नजर आ सकता है। तारुष रोहित शर्मा और वैभव सूर्यवंशी से प्रभावित है।