
भीलवाड़ा। एक घर में दूसरे बच्चे के जन्म की खुशियां थीं, तो दूसरे परिवार में पहली बार किलकारी गूंजी थी। लेकिन कुछ ही घंटों में दोनों घरों की खुशियां मातम में बदल गई। महात्मा गांधी अस्पताल की मातृ एवं शिशु इकाई में दो प्रसूताओं की मौत ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच और समय पर उपचार में लापरवाही आखिर कितनी भारी पड़ रही है।
कोटड़ी क्षेत्र के दांतड़ा गांव निवासी 22 वर्षीय सुगना पत्नी मोहन बैरवा के घर दूसरे बच्चे के जन्म का इंतजार खत्म हुआ ही था, लेकिन मां अपने नवजात को ठीक से देख भी नहीं सकी। शाहपुरा सेटेलाइट अस्पताल में सामान्य प्रसव के बाद उसे अत्यधिक रक्तस्राव होने लगा। हालत बिगड़ने पर उसे तत्काल भीलवाड़ा के एमजीएच रेफर किया गया। अस्पताल पहुंचने तक उसकी पल्स और ब्लड प्रेशर नहीं मिल रहे थे। जांच में एचबी मात्र 1.8 ग्राम और प्लेटलेट्स केवल 4 हजार पाए गए। डॉक्टरों ने आईसीयू में भर्ती कर वेंटिलेटर सपोर्ट दिया, ब्लड और प्लेटलेट्स चढ़ाए तथा हरसंभव उपचार किया, लेकिन शरीर अत्यधिक रक्तस्राव से जवाब दे चुका था।
कोटड़ी क्षेत्र के कोठाज निवासी एवं वर्तमान में पटेलनगर में रह रही 18 वर्षीय रानी पत्नी भूरा बंजारा के जीवन का सबसे बड़ा सपना मां बनने का था। एमसीएच में उसकी सामान्य डिलीवरी हुई और पहली संतान के जन्म से परिवार में खुशी छा गई। लेकिन यह खुशी ज्यादा देर टिक नहीं सकी। प्रसव के करीब एक घंटे बाद अचानक रानी को अत्यधिक रक्तस्राव शुरू हो गया। डॉक्टरों की टीम ने तत्काल उपचार शुरू किया, लेकिन गंभीर चिकित्सीय जटिलता के चलते उसे एम्बोलिजम हो गया। लगातार प्रयासों के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका।
मजबूत होना चाहिए और नए डॉक्टरों व मेडिकल स्टाफ को नियमित प्रशिक्षण मिलना चाहिए, ताकि हर प्रसूता की जान बचाई जा सके।
-डॉ. सुशीला आगीवाल, सेवानिवृत प्रोफेसर, आरवीआरएस मेडिकल कॉलेज, भीलवाड़ा
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आशा और एएनएम कार्यकर्ताओं को हाई-रिस्क प्रेगनेंसी की पहचान शुरुआती चरण में ही कर तुरंत इलाज शुरू करना चाहिए। समाज में फैली भ्रांतियों को खत्म कर गर्भवती महिला को दिन में 5-6 बार पौष्टिक आहार, दूध और फल देने की जरूरत है। इसके साथ ही सब-सेंटर से लेकर मेडिकल कॉलेज तक का रेफरल नेटवर्क