
Chhattisgarh High Court: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग में प्रभारी डीईओ और बीईओ की नियुक्ति को लेकर चल रहे विवाद पर अहम फैसला सुनाया है। जस्टिस बीडी गुरु ने स्पष्ट किया कि केवल वरिष्ठता के आधार पर कोई अधिकारी उच्च पद का प्रभार पाने का कानूनी अधिकार नहीं जता सकता। कोर्ट ने कहा कि प्रभारी नियुक्ति एक अस्थायी प्रशासनिक व्यवस्था है और इसमें शासन अधिकारी की उपयुक्तता, अनुभव और प्रशासनिक जरूरत को ध्यान में रख सकता है। इस फैसले के साथ ही गरियाबंद में जूनियर अधिकारी को प्रभारी डीईओ बनाए जाने के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी गई है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि केवल सीनियरिटी के आधार पर किसी अधिकारी को उच्च पद का प्रभार देने की बाध्यता नहीं है। जब तक किसी नियम या कानून में वरिष्ठ अधिकारी को ही प्रभार देने की अनिवार्यता तय नहीं है, तब तक सीनियरिटी के आधार पर प्रभारी पद पर दावा नहीं किया जा सकता। कोर्ट के मुताबिक, प्रभारी व्यवस्था स्थायी पदोन्नति नहीं होती। इसलिए सक्षम प्राधिकारी प्रशासनिक परिस्थितियों के आधार पर किसी अधिकारी का चयन कर सकता है।
कोर्ट ने माना कि उच्च पद का प्रभार सौंपते समय केवल वरिष्ठता ही एकमात्र मापदंड नहीं हो सकती। अधिकारी की कार्यशैली, अनुभव, प्रशासनिक आवश्यकता और उसकी समग्र उपयुक्तता को भी देखा जा सकता है। यदि नियुक्ति में किसी नियम का उल्लंघन या दुर्भावना साबित नहीं होती है, तो अदालत प्रशासनिक निर्णय में हस्तक्षेप नहीं करेगी।
मामला स्कूल शिक्षा विभाग के 10 जून 2026 के आदेश से जुड़ा है। इस आदेश के तहत प्राचार्य राजेश चंद्राकर को गरियाबंद का प्रभारी डीईओ नियुक्त किया गया था। इस नियुक्ति को छुरा ब्लॉक में पदस्थ बीईओ किशुन लाल मातवाले ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उनका कहना था कि वे वर्ष 1995 से शिक्षा विभाग में सेवा दे रहे हैं और राजेश चंद्राकर से वरिष्ठ हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा सेवा नियम 2026 के तहत डीईओ पद के लिए पात्र होने का भी दावा किया था।
इस फैसले का असर बिलासपुर समेत प्रदेश के अन्य जिलों में लंबित प्रभारी डीईओ-बीईओ नियुक्तियों पर पड़ सकता है। इससे शासन को वरिष्ठता के अलावा प्रशासनिक जरूरत और अधिकारी की उपयुक्तता के आधार पर प्रभार देने का रास्ता साफ हुआ है।