
Bilaspur High Court: छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाई कोर्ट ने सेवानिवृत्त वन अधिकारी को बड़ी राहत दी है। नारायणपुर वन मंडल के सेवानिवृत्त रेंजर बीरभद्र देवांगन से करीब 15 साल पुराने सागौन पौधारोपण मामले में 4,88,891 रुपए की वसूली के लिए वन विभाग की ओर से जारी आदेश को कोर्ट ने निरस्त कर दिया है।
जस्टिस बीडी गुरु की सिंगल बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद इस तरह की वसूली की कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित विधिक सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि यदि वसूली की रकम पेंशन या अन्य सेवानिवृत्ति लाभों से काटी या रोकी गई है, तो उसे निर्धारित अवधि में वापस किया जाए।
बीरभद्र देवांगन नारायणपुर वन मंडल में रेंजर के पद पर पदस्थ थे। उनका कार्यकाल वर्ष 2010-11 में नारायणपुर सर्कल में रहा था। इसी दौरान सागौन पौधारोपण का काम कराया गया था। वन विभाग का आरोप था कि यह पौधारोपण अपेक्षित रूप से सफल नहीं हुआ, जिससे शासन को आर्थिक नुकसान हुआ। इसी पुराने मामले को आधार बनाकर विभाग ने सेवानिवृत्ति के बाद बीरभद्र देवांगन के खिलाफ वसूली की कार्रवाई शुरू की। हालांकि, याचिकाकर्ता का कहना था कि उनके सेवाकाल के दौरान इस कथित नुकसान को लेकर कोई विभागीय जांच नहीं की गई थी।
बीरभद्र देवांगन 31 जुलाई 2022 को रेंजर के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। इसके करीब दो वर्ष बाद 5 अगस्त 2024 को वन विभाग ने उन्हें नोटिस जारी किया। नोटिस में वर्ष 2010-11 में नारायणपुर सर्कल में उनके कार्यकाल के दौरान कराए गए सागौन पौधारोपण के असफल होने का हवाला दिया गया। विभाग ने आरोप लगाया कि पौधारोपण सफल नहीं होने के कारण शासन को आर्थिक नुकसान हुआ है। देवांगन ने विभाग के नोटिस का जवाब भी प्रस्तुत किया। हालांकि, विभाग ने उनके जवाब को स्वीकार नहीं किया और आगे वसूली की कार्रवाई शुरू कर दी।
वन विभाग ने 8 अप्रैल 2025 को बीरभद्र देवांगन से 4,88,891 रुपए की वसूली का आदेश जारी कर दिया। विभागीय आदेश के बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा। याचिकाकर्ता ने इस रिकवरी आदेश को चुनौती देते हुए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में याचिका दायर की। उनकी ओर से तर्क दिया गया कि जिस मामले को आधार बनाकर वसूली की जा रही है, वह करीब 15 वर्ष पुराना है। साथ ही सेवाकाल के दौरान इस कथित नुकसान को लेकर कोई विभागीय जांच नहीं की गई थी।
याचिका में यह भी कहा गया कि बीरभद्र देवांगन तृतीय श्रेणी कर्मचारी के रूप में सेवा से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। उनके खिलाफ किसी तरह की धोखाधड़ी या गलत तरीके से लाभ लेने का आरोप नहीं है। ऐसे में सेवानिवृत्ति के बाद पुराने मामले को आधार बनाकर उनके खिलाफ लाखों रुपए की वसूली की कार्रवाई को चुनौती दी गई। मामले में कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह भी था कि क्या सेवानिवृत्ति के बाद इतने पुराने मामले को आधार बनाकर इस तरह की रिकवरी की जा सकती है और क्या इसके लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया था।
याचिका की सुनवाई जस्टिस बीडी गुरु की सिंगल बेंच में हुई। कोर्ट ने वन विभाग द्वारा 8 अप्रैल 2025 को जारी 4,88,891 रुपए की वसूली के आदेश को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने माना कि इस तरह की वसूली के मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित विधिक सिद्धांतों का पालन किया जाना आवश्यक है। इस फैसले से सेवानिवृत्त रेंजर बीरभद्र देवांगन को बड़ी राहत मिली है।
हाई कोर्ट ने केवल रिकवरी आदेश को रद्द ही नहीं किया, बल्कि वन विभाग को राशि वापस करने के संबंध में भी स्पष्ट निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि यदि विवादित वसूली आदेश के आधार पर याचिकाकर्ता की पेंशन या अन्य सेवानिवृत्ति लाभों से कोई राशि काटी या रोकी गई है, तो उसे वापस किया जाए। इसके लिए कोर्ट ने आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से छह महीने की समयसीमा निर्धारित की है।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि सेवानिवृत्त कर्मचारियों से रिकवरी के मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कानूनी सिद्धांतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सरकारी कर्मचारी की सेवा समाप्त होने और सेवानिवृत्ति लाभ तय होने के बाद किसी पुराने मामले में वित्तीय वसूली करने के लिए विभाग को लागू कानूनी प्रावधानों और निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने वन विभाग की ओर से जारी रिकवरी आदेश को निरस्त कर दिया।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जिस सागौन पौधारोपण को आधार बनाकर वसूली का आदेश जारी किया गया, वह वर्ष 2010-11 का है। यानी कार्रवाई का आधार बनने वाली घटना और रिकवरी आदेश के बीच लंबा अंतर रहा। याचिकाकर्ता की ओर से इसी देरी और सेवाकाल के दौरान विभागीय जांच नहीं होने को प्रमुख आधार बनाया गया था। फिलहाल हाई कोर्ट ने 8 अप्रैल 2025 के रिकवरी आदेश को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता को राहत दी है और यदि पेंशन या अन्य सेवानिवृत्ति लाभों से कोई राशि काटी या रोकी गई है तो उसे छह महीने के भीतर वापस करने का निर्देश दिया है।