
Bharat Bhhagya Viddhaata Released: कंगना रनौत की फिल्म 'भारत भाग्य विधाता' आज यानी 12 जून को सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। फिल्म को अब तक लोगों के अच्छे रिव्यू मिले हैं। हालांकि अभी कुछ भी कहना काफी जल्दबाजी होगी क्योंकि शानदार कहानी होने के बावजूद फिल्म बॉक्स ऑफिस पर क्या करती है, इस पर फिल्म की सफलता आंकी जाएगी। इसी बीच फिल्म क्रिटिक ने कंगना की फिल्म का रिव्यू देने से ही मना कर दिया है। क्या है पूरा मामला, चलिए जानते हैं।
फिल्म विश्लेषक कमाल आर खान ने सीधे-सीधे कंगना की फिल्म का नाम तो नहीं लिया है लेकिन उन्होंने एक्स पर पोस्ट करते हुए अपनी बात कही है। कमाल राशिद खान ने एक्स पर पोस्ट लिखा- 'आज जो भी सी-ग्रेड फिल्में रिलीज हुई हैं मैं उन फालतू की फिल्मों का रिव्यू नहीं करूंगा।' उन्होंने आगे बात करते हुए कहा कि वो बेकार फिल्मों को देखकर अपना समय बर्बाद नहीं करते।
बता दें आज यानी 12 जून को कंगना रनौत की फिल्म 'भारत भाग्य विधाता' रिलीज होने के साथ-साथ दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'मैं वापस आऊंगा' भी रिलीज हुई है। इम्तियाज अली ने इस फिल्म को डायरेक्ट किया है। सिनेमाघरों में सीधे-सीधे कंगना रनौत और दिलजीत दोसांझ के बीच टक्कर देखने को मिल रही है। फिलहाल कंगना की तरफ से केआरके की इस टिप्पणी पर कोई रिएक्शन नहीं आया है।
फिल्म 'भारत भाग्य विधाता' की कहानी एक थाने से शुरू होती है, जहां एक पुलिस अधिकारी गीता गांधारे (कंगना रनौत) से उस आतंकी की पहचान करने के लिए कहता है, जिसने कामा अस्पताल में खूनी हमला किया था। परिवार के लोग उसे इस प्रक्रिया से दूर रहने की सलाह देते हैं, लेकिन तभी गीता के जेहन में वह पल ताजा हो उठता है, जब उसने नर्स की वर्दी पहनते हुए हर हाल में अपने फर्ज को निभाने की शपथ ली थी।
कंगना की फिल्म को अब तक मिले-जुले रिएक्शन्स देखने को मिल रहे हैं। एक यूजर ने लिखा- फिल्म में कंगना रनौत और बाकी कलाकारों ने दमदार अभिनय किया है, लेकिन औसत निर्देशन और निष्पादन इसकी रफ्तार को पूरी तरह संभाल नहीं पाता। जिस थ्रिल और रोमांच पर कहानी टिकी है, वो प्रभाव छोड़ने में सिर्फ आंशिक रूप से सफल रहता है। कुल मिलाकर यह एक औसत अनुभव देने वाली फिल्म बनकर रह जाती है।
फिल्म की शुरुआत प्रमुख किरदारों के परिचय से होती है, जहां कहानी धीरे-धीरे अपना आधार तैयार करती है। हालांकि कलाकारों का अभिनय दर्शकों को बांधे रखता है, लेकिन पटकथा और प्रस्तुति में वो धार नहीं दिखती जिसकी इस विषय से उम्मीद की जाती है। फिर भी कुछ इमोशनल और इंस्पायरिंग पल फिल्म को देखने लायक बनाते हैं।