Sandeepa Dhar Exclusive Interview: संजय लीला भंसाली के प्रोडक्शन हाउस में बनी और रवि उदयकर के निर्देशन में बनी 'दो दीवाने सहर में' में अहम किरदार निर्भर रहीं संदीपा धर ने पत्रिका से खास बातचीत में सेल्फ एक्सेप्टेंस, सिबलिंग कंपैरिजन और सोशल वैलिडेशन पर की खुलकर बात।
Sandeepa Dhar Exclusive Interview: बीती 20 फरवरी को सिद्धांत चतुर्वेदी और मृणाल ठाकुर की फिल्म 'दो दीवाने शहर में' रिलीज हो गई है, फिल्म को दर्शकों का अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है। फिल्म सिर्फ एक मॉडर्न लव स्टोरी नहीं, बल्कि आज की पीढ़ी के उस संघर्ष की कहानी है, जहां लोग खुद को स्वीकार करने की लड़ाई लड़ रहे हैं। फिल्म के किरदारों की बात की जाए तो जहां शशांक (सिद्धांत चतुर्वेदी) और रोहिणी (मृणाल ठाकुर) सेल्फ एक्सेप्टेंस से स्ट्रगल कर रहे हैं। वहीं, फिल्म में एक किरदार है 'नैना' (संदीपा धर) का है। नैना एक ऐसी लड़की हैं जो अपनी शादीशुदा जिंदगी में बहुत खुश नजर आती है, लेकिन अंदर ही अंदर वो क्या झेल रही है वो किसी को नहीं पता है।
आज हम आपके लिए फिल्म में नैना का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री संदीपा धर के साथ पत्रिका की एक्सक्लूसिव बातचीत लेकर आ रहे हैं, जिसमें उन्होंने फिल्म की कहानी, अपने किरदार, सेल्फ एक्सेप्टेंस, सिबलिंग कंपैरिजन, सोशल वैलिडेशन और महिलाओं पर समाज के दबाव जैसे कई मुद्दों पर खुलकर बात की। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि कैसे उनका किरदार दिखने में परफेक्ट लगने वाली जिंदगी के पीछे छिपी असुरक्षा और अकेलेपन को सामने लाता है।
आपकी नई फिल्म 'दो दीवाने शहर में' को लेकर काफी पॉजिटिव रिस्पॉन्स मिल रहा है। यह दो मिलेनियल्स की लव स्टोरी है जो सेल्फ एक्सेप्टेंस से जूझ रहे हैं। क्या आप भी कभी ऐसे दौर से गुजरी हैं? और जो लोग खुद को स्वीकार नहीं कर पाते हैं, उनके लिए आपका क्या मैसेज है?
इस फिल्म में मैं ‘नैना’ का किरदार निभा रही हूं। ऑन पेपर देखें तो नैना की जिंदगी परफेक्ट लगती है, वो खूबसूरत है, सॉर्टेड है, अच्छी फैमिली से है और एक अमीर आदमी से उसकी शादी हुई है। लेकिन असलियत में वो अपनी ही जिंदगी में फंसी हुई है। वह लगातार डाइट करती है, ब्यूटी ट्रीटमेंट करवाती है और सिर्फ अपने पति से वैलिडेशन पाने के लिए खुद को बदलने की कोशिश करती रहती है।
इसके आगे संदीपा ने कहा, 'फिल्म का डायनामिक भारतीय परिवारों में होने वाली सिबलिंग कंपैरिजन को एक्सप्लोर करता है। जैसे बचपन में अक्सर कहा जाता है, “अपने भाई-बहन जैसा बनो”, “उससे सीखो।” तब शायद पेरेंट्स को एहसास नहीं होता कि ये तुलना बच्चों पर कितना गहरा असर डालती है। बड़े होकर समझ आता है कि ये हेल्दी नहीं था।
आज भी लड़कियों को कहा जाता है, 'वजन कम करो, 'थोड़ा और गोरा बनो', 'स्किन ट्रीटमेंट कराओ', ताकि शादी या समाज में उन्हें स्वीकार किया जाए। हम सब कहीं न कहीं वैलिडेशन ढूंढते रहते हैं, चाहे वो पेरेंट्स से हो, पार्टनर से या फिर सोशल मीडिया पर हो।
"मेरा मैसेज यही है कि सबसे जरूरी वैलिडेशन खुद की होती है। आपको खुद से कहना होगा, 'मैं जैसी हूं, ठीक हूं और काफी हूं।' जब आप खुद से खुश रहना सीख जाते हैं, तो दुनिया की राय मायने नहीं रखती।"
इस फिल्म से आपकी इमेज को एक नया टर्न मिला है। आपने पहले ‘अभय’ और ‘डॉक्टर अरोड़ा’ जैसी सीरीज की हैं। इस फिल्म से आप खुद में कितना बदलाव महसूस करती हैं?
इस सवाल के जवाब पर संदीपा कहती हैं, 'बिल्कुल, यह रोल मेरे पिछले प्रोजेक्ट्स से काफी अलग है। ‘अभय’ और ‘डॉक्टर अरोड़ा’ से हटकर इस फिल्म में मुझे एक मॉडर्न बॉम्बे गर्ल के रूप में दिखाया गया है, जो ग्लैमरस, स्टाइलिश और कॉन्फिडेंट है।
'फिल्म के डायरेक्शन और विजन की वजह से मुझे स्क्रीन पर बहुत खूबसूरती से प्रेजेंट किया गया है। यह मेरे लिए एक शानदार मौका था क्योंकि इस किरदार ने मुझे एक अलग लुक और पर्सनालिटी में पेश किया।'
क्या फिल्म का कोई सीन ऐसा था जिसने आपको इमोशनली प्रभावित किया या जो आपके लिए सबसे ज्यादा चैलेंजिंग रहा?
हां, मेरा एक कॉन्फ्रंटेशन सीन और ब्रेकडाउन सीन काफी इमोशनल और चुनौतीपूर्ण था। वह फिल्म का टर्निंग पॉइंट है। उस सीन में मुझे पूरी तरह ऑथेंटिक तरीके से रोना था।
मैं ग्लिसरीन का इस्तेमाल नहीं करती, इसलिए मुझे खुद उस इमोशन में जाना पड़ता है। सुबह से ही खुद को उस फीलिंग के लिए तैयार करना पड़ता है। ऐसे सीन में प्रेशर भी होता है, क्योंकि आपको पता होता है कि आपके पास सिर्फ कुछ टेक्स ही होंगे। अगर वो सीन सही नहीं बैठता, तो फिल्म का असर भी कम हो सकता है। लेकिन शुक्र है कि पूरी टीम बहुत सपोर्टिव थी और सीन बहुत अच्छा निकलकर आया।
आपकी सीरीज ‘डॉक्टर अरोड़ा’ एक बोल्ड और सेंसिटिव सब्जेक्ट पर आधारित थी, जिसमें सेक्सुअलिटी और समाज के दोहरे मापदंडों पर बात की गई थी। उसे करते वक्त आप कितनी कंफर्टेबल थीं?
'मैं उस सब्जेक्ट को लेकर पूरी तरह कंफर्टेबल थी। मुझे लगता है कि जब कंटेंट अच्छे और सेंसिटिव तरीके से लिखा और डायरेक्ट किया गया हो, तो अनकंफर्टेबल होने की गुंजाइश कम रह जाती है।
यह एक बहुत जरूरी विषय था, जिसे बेहद सेंसिटिव तरीके से हैंडल किया गया। ऐसा शो बनाना आसान नहीं होता, क्योंकि वह आसानी से क्रैश या वल्गर हो सकता है, लेकिन इसे बहुत बैलेंस्ड तरीके से पेश किया गया।
मेरे लिए थोड़ा चैलेंजिंग इसलिए था क्योंकि मैं पर्सनली थोड़ी शाय और इंट्रोवर्ट हूं। उस तरह का किरदार निभाना मेरे लिए नया अनुभव था। लेकिन यही तो एक एक्टर की खूबसूरती है, 'हम वो किरदार निभाते हैं जो हमसे बिल्कुल अलग होते हैं।'
संजय लीला भंसाली के प्रोडक्शन हाउस में बनी और रवि उदयकर के निर्देशन में बनी 'दो दीवाने सहर में' में इला अरुण, जॉय सेनगुप्ता, आयशा रजा मिश्रा, जैसे बेहतरीन कलाकारों ने अहम किरदार निभाए हैं। फिल्म की कहानी काफी यूनीक है, जिसमें दो मिलेनियल जो 'Self-Acceptance' से स्ट्रगल कर रहे हैं, और एक दूसरे के प्यार में पड़ जाते हैं। कैसे दोनों अपनी खुद की परसनैलिटी को स्वीकारते हैं खुद को स्वीकारते हैं और अपने प्यार का इजहार करते हैं, फिल्म में यही दिखाया गया है।