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सोना, तेल, पेट्रोल कम खरीदेंगे तो भी बढ़ने वाली है आम लोगों की मुश्किल- ये हैं 5 संकेत

PM Modi Austerity Appeal: लंबा खिंचते पश्चिम एशिया संकट के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में लोगों से सोना नहीं खरीदने, पेट्रोल-डीजल बचाने और तेल कम खाने की जो अपील की है उस पर सौ फीसदी अमल कर भी लिया तो परेशानियों से छुटकारा नहीं मिलने वाला है। इन पांच संकेतों का विश्लेषण पढ़िए तो बात समझ में आ जाएगी।

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May 15, 2026
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सोने की सांकेतिक तस्वीर। (फोटो- AI Generated)

पेट्रोल-डीजल बचाने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील के बाद कई राज्यों में अलग-अलग कदम उठाए गए हैं। आप खुद भी भले ही खपत कम कर दें, लेकिन पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने के पूरे आसार हैं। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी और रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा भी इसके संकेत दे चुके हैं। कीमत बढ़ते ही आप पर इसकी चौतरफा मार पड़नी तय है। कई जगह सवारियों और सामान की ढुलाई पहले ही महंगी हो चुकी है। पेट्रोल-डीजल महंगा होते ही वृद्धि का एक और 'आधिकारिक' दौर झेलना पड़ सकता है।

एलपीजी के मामले में हम यह देख चुके हैं। संकट शुरू होते ही कालाबाजारी बढ़ी। इसके आधार पर रोज मर्रा की जरूरत और खाने-पीने की चीजें महंगी हुईं। बाद में जब सरकार ने कमर्शियल सिलेन्डर महंगा किया तो संगठित रूप से रेस्तरां आदि में रेट बढ़ाए गए।

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पेट्रोल सरकार को दे रहा दोहरी मार

पश्चिम एशिया संकट के मद्देनजर पेट्रोल सरकार को दोहरी मार दे रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा हो रहा है। इसे खरीदने के लिए सरकार को ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। दूसरी ओर, रुपया लगातार कमजोर होने के चलते यह कीमत सरकार को और ज्यादा पड़ रही है। सरकार का विदेशी मुद्रा भंडार हल्का हो रहा है।

तेल कंपनियों का घाटा एक अलग ही फैक्टर है। कहा जा रहा है कि तेल कंपनियां रोज 1000-1200 करोड़ रुपये का घाटा सह रही हैं। जनवरी से मार्च 2026 के बीच सरकार पर तेल कंपनियों का बकाया करीब दो लाख करोड़ रुपये पहुंच चुका है।

गरीब और गरीब होंगे

इजरायल और अमरीका ने ईरान पर पहला हमला 28 फरवरी को किया था। तब शायद अमरीका को भी उम्मीद नहीं थी कि लड़ाई इतनी लंबी खिंच जाएगी। लंबी लड़ाई का खामियाजा भारत सहित दुनिया के कई देशों को भुगतना पड़ रहा है। लड़ाई की वजह से दुनिया भर में न केवल तेल-गैस, बल्कि खाद और जरूरत के कई अन्य सामान की सप्लाई प्रभावित हुई है। गरीबों व मध्य वर्ग पर इसका ज्यादा असर हो रहा है।

फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ न्यूयॉर्क के अर्थशास्त्रियों ने हाल में अमरीकियों पर एक अध्ययन किया। इसमें पता चला कि मार्च में अमीर परिवारों ने ईंधन पर अपना खर्च थोड़ा बढ़ा दिया और खपत बराबर रखी। कम आमदनी वाले परिवारों ने खपत थोड़ी घटा दी, फिर भी दाम बढ़ जाने के चलते उनका खर्च बढ़ गया।

लंबी चल रही यह लड़ाई तमाम देशों में अर्थव्यवस्था को इसी रूप की ओर धकेलती जा रही है। अर्थशास्त्र में इसे 'K-shaped Economy' कहते हैं। इस तरह की अर्थव्यवस्था में अमीरों और गरीबों के बीच खाई और बढ़ती है।

महंगाई की चौतरफा मार

भारत का 60 फीसदी एलपीजी दूसरे देशों से आता है। इसका ज़्यादातर हिस्सा कतर, यूएई, सऊदी अरब और कुवैत जैसे देशों से आता है। दूसरे देशों से आने वाले 90 प्रतिशत एलपीजी का रास्ता स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर है। यह रास्ता बंद है।
एलपीजी संकट की वजह से कई होटल-ढाबे बंद हो गए, जो चल रहे हैं उन्होंने खाना 10-50 फीसदी (8 रुपये की रोटी 12 में) महंगा कर दिया है।

इलेक्ट्रिक कारें तक महंगी होने लगीं। बीवाईडी इंडिया ने आयात खर्च बढ़ने का हवाला देकर अपनी कारें महंगी करने की घोषणा कर दी है।

सामान की ढुलाई महंगी हो गई है। सामान या सवारियां ढोने वाले बड़े वाहनों में इस्तेमाल होने वाले डीईएफ की सप्लाई भी प्रभावित होने का खतरा है। डीईएफ बनाने में टेक्निकल ग्रेड यूरिया (टीजीयू) का इस्तेमाल होता है। इसे दुबई और मिस्र से मंगाया जाता है। सियाम ने चेताया है कि इसकी सप्लाई बाधित हुई तो बस-ट्रकों का चलाना मुश्किल हो जाएगा।

यूरिया की किल्लत न हो, इसके लिए भी सरकार को मशक्कत करनी होगी। यूरिया उत्पादन में एलएनजी की भारी जरूरत होती है। कतर से एलएनजी की सप्लाई बाधित होने के चलते यूरिया बनाने वाले कई कारखाने बंद हो चुके हैं।

विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव

विदेशी मुद्रा आने के दो मुख्य जरिये हैं। एक तो आयात और दूसरा निवेश। 1990 के दशक से ही आम तौर पर ट्रेंड रहा है कि भारतीय जितना सामान विदेश भेजते नहीं हैं, उससे ज्यादा विदेश से मंगवाते हैं। मतलब, जितना डॉलर आता नहीं है, उससे ज्यादा चला जाता है। हालांकि, निवेश के मामले में स्थिति अलग है। जितना विदेशी निवेश भारत आता है, भारतीय दूसरे देशों में उतना पैसा नहीं लगाते। मतलब निवेश के जरिये डॉलर ज्यादा आता है। लेकिन जब रुपया कमजोर होता है तब भारतीयों द्वारा विदेश में कम निवेश करने की स्थिति में भी डॉलर ज्यादा मात्रा में निकल जाता है। और आयात करने में भी ज्यादा डॉलर खर्च होते हैं। अभी यही स्थिति है। ऊपर से विदेशी निवेशक भी अपना पैसा खींच रहे हैं।

डॉलर बढ़ाने के बजाय खर्च घटाने का उपाय

जब आप आर्थिक तंगी में होते हैं तो अमूमन दो ही तरीके अपनाते हैं- या तो खर्च कम करते हैं या आमदनी बढ़ाते हैं। जाहिर है, पहला तरीका आसान तो है, लेकिन आपको आर्थिक मजबूती नहीं दे सकता। इसलिए, दूसरा तरीका हमेशा बेहतर है। लेकिन, प्रधानमंत्री ने विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम करने के लिए जो मंत्र दिए हैं, वे सब पहली स्थिति वाले उपाय हैं। यानि, खपत घटा लो। इसका नकारात्मक असर कई दूसरे व्यवसाय और सेक्टर पर भी पड़ सकता है। यह अंततः देश की आर्थिक स्थिति कमजोर ही करेगा।

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