
Chhatarpur News : दुनिया भर में फीफा वर्ल्ड कप 2026 का रोमांच शुरू हो गया है। चारों तरफ फुटबॉल का जुनून सिर चढ़कर बोल रहा है, लेकिन मध्य प्रदेश राज्य के अंतर्गत आने वाले बुंदेलखंड के केंद्र कहे जाने वाले छतरपुर जिले में फुटबॉल की धड़कनें थमी हुई हैं। एक तरफ जहां दुनिया फुटबॉल के मैदानों पर दौड़ रही है, वहीं छतरपुर के खिलाड़ी और खेल प्रेमी इस बात को लेकर मायूस हैं कि, उनके शहर की सबसे बड़ी खेल धरोहर पिछले कई सालों से धूल फांक रही है।
देश की फुटबॉल रैंकिंग में 7वां स्थान रखने वाला और 70 साल पुराना गौरवशाली एसएन बनर्जी अखिल भारतीय फुटबॉल टूर्नामेंट कोरोना काल के बाद से दोबारा शुरू नहीं हो सका है। कभी देश के शीर्ष खेल आयोजनों में शुमार यह टूर्नामेंट पिछले दो-तीन वर्षों से नगर पालिका और विश्वविद्यालय प्रबंधन की लापरवाही की भेंट चढ़ा हुआ है। अब जबकि टूर्नामेंट के आयोजन में कोई बड़ी प्रशासनिक अड़चन नहीं है, फिर भी जिम्मेदार खामोश बैठे हैं।
यह टूर्नामेंट वर्ष 1956 में महाराजा महाविद्यालय के लोकप्रिय शिक्षक सुरेंद्रनाथ बनर्जी की याद में शुरू किया था। इसे मेला जलविहार टूर्नामेंट के नाम से जाना जाता था, जिसे तत्कालीन छतरपुर महाराज भवानी सिंह देव आर्थिक मदद करते थे। बाद में इसका नाम एसएन बनर्जी टूर्नामेंट कर दिया। देश का ये पहला ऐसा प्रतिष्ठित टूर्नामेंट है, जो किसी शिक्षक के नाम पर होता आ रहा है और 57 सफल आयोजन हो चुके हैं, लेकिन अब 6 साल से बंद है। इस आयोजन से छतरपुर की तीन पीढ़ियों की यादें और भावनाएं जुड़ी हुई हैं।
छतरपुर के बाबूराम चतुर्वेदी स्टेडियम में आयोजित होने वाले टूर्नामेंट की जिम्मेदारी पहले महाराजा कॉलेज जो बाद में छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय बना, उसका प्रबंधन संभालता था। बाद में इसकी कमान नपा को सौंप दी गई। कोरोना के दौरान इस पर रोक लगाई थी, लेकिन महामारी के बाद पिछले वर्षो में स्टेडियम में चल रहे निर्माण और प्रशासनिक उदासीनता को बहाना बनाया। वर्तमान में स्टेडियम में निर्माण से जुड़ी कोई अड़चन नहीं है, इसके बाद इस साल भी आयोजन को लेकर खेल विभाग या नपा की ओर से कोई रोडमैप दिखाई नहीं दे रहा है।
टूर्नामेंट में विजेता टीम को जो शील्ड दी जाती है, उसे एशिया की सबसे बड़ी शील्ड होने का गौरव प्राह्रश्वत है। इस ऐतिहासिक शील्ड का निर्माण तत्कालीन छतरपुर महाराज ने करवाया था। टूर्नामेंट का एक नियम है कि इस शील्ड पर कब्जा वही टीम कर सकती है, जो लगातार 3 बार फाइनल मुकाबला जीतेगी। अब तक के रिकॉर्ड में 6 बार महाराष्ट्र की टीम ने इस खिताब को अपने नाम किया है।
मामले को लेकर नगर पालिका अध्यक्ष ज्योति चौरसिया का कहना है कि, कोरोना काल और स्टेडियम में निर्माण कार्यों के कारण टूर्नामेंट पिछले समय में आयोजित नहीं करा सके। इस बार प्रयास करेंगे कि, खेल विभाग और विवि प्रबंधन से समन्वय बनाकर बनर्जी टूर्नामेंट को शुरू कराया जा सके।
जिले के फुटबाल खिलाड़ी मदन दुबे का कहना है कि, टूर्नामेंट से छतरपुर को देशभर में पहचान मिली। यहीं से खेलकर कई राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी भी निकले हैं। टूर्नामेंट बंद होने से ग्रासरूट फुटबॉल पिछड़ गई है। स्कूलों और कॉलेजों के बच्चों को आगे बढ़ने का कोई मंच नहीं मिल रहा है।
-टूर्नामेंट का नाम: एसएन बनर्जी अखिल भारतीय फुटबॉल
-टूर्नामेंट शुरुआत का वर्ष: 1956 (70 साल पुरानी खेल धरोहर)
-देश में रैंकिंग: फुटबॉल आयोजनों में 7वां स्थान
-मुख्य आकर्षण: एशिया की सबसे बड़ी शील्ड (लगातार 3 बार जीतने पर हक)
-आयोजन स्थल: बाबूराम चतुर्वेदी स्टेडियम, छतरपुर
-मुख्य समस्या: कोरोना काल के बाद से प्रशासनिक लापरवाही, विवि व नपा के बीच समन्वय की कमी से आयोजन ठप
-जिम्मेदार विभाग: नगरपालिका छतरपुर, विश्वविद्यालय एवं जिला खेल विभाग
-क्या चाहिए सुधार: तत्काल बजट आवंटन कर खेल कैलेंडर के अनुसार टूर्नामेंट की दोबारा शुरुआत की जाए