
-रविप्रकाश चावला
बावड़ी (चूरू): घर में शौचालय होता तो शायद आज अविनाश अपनी मां की गोद में खेल रहा होता। परिवार की आंखों में उसकी यादें हैं और घर में ऐसा सन्नाटा पसरा है, जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। महाराष्ट्र में मजदूरी कर परिवार का पेट पालने वाला पिता किशनलाल वर्मा जब घर लौटा तो उसका दो साल का मासूम बेटा दुनिया में नहीं था। 21 अक्टूबर को मां को ढूंढते हुए रेलवे ट्रैक तक पहुंचे अविनाश की सीकर से जयपुर जा रही डेमू ट्रेन की चपेट में आने से मौत हो गई थी। यह हादसा परिवार के लिए कभी न भरने वाला जख्म बन गया। साथ ही, गांव में बुनियादी सुविधाओं और सरकारी योजनाओं के लाभ को लेकर किए जा रहे दावों पर भी सवाल खड़े कर गया।
ठीकरिया के राजस्व गांव बाजियों की ढाणी में रहने वाले इस परिवार की आर्थिक स्थिति लंबे समय से कमजोर है। परिजनों के अनुसार, वर्ष 2007 के आसपास सरकारी योजना के तहत परिवार को दो कमरे बनाकर दिए गए थे, लेकिन करीब 19 साल बाद भी घर में शौचालय, पानी का टांका और बीपीएल विद्युत कनेक्शन जैसी सुविधाएं नहीं मिल सकीं। परिवार का कहना है कि शौचालय निर्माण के लिए सरपंच से दो बार गुहार लगाई, लेकिन सुनवाई नहीं हुई।
21 अक्टूबर की सुबह बच्चे की मां सीमा देवी शौच के लिए घर से बाहर गई थीं। इसी दौरान अविनाश मां को ढूंढते हुए रेलवे ट्रैक तक पहुंच गया। सुबह करीब सवा आठ बजे सीकर से जयपुर जा रही डेमू ट्रेन की चपेट में आने से उसकी मौत हो गई। हादसे के समय पिता किशनलाल मजदूरी के लिए महाराष्ट्र गया हुआ था। परिवार में छह साल का एक और बेटा अभिषेक है। अविनाश की मौत ने पूरे परिवार को तोड़कर रख दिया है।
किशनलाल वर्मा ने बताया कि करीब दो साल पहले बीमारी के कारण उनके पिता श्योपाल वर्मा की मौत हो गई थी। पिता का साया उठने के बाद परिवार की जिम्मेदारी दोनों भाइयों के कंधों पर आ गई। आर्थिक तंगी के चलते पढ़ाई बीच में छोड़कर मजदूरी करनी पड़ी। परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए किशनलाल को महाराष्ट्र जाकर काम करना पड़ता है। अभावों के बीच जिंदगी आगे बढ़ रही थी, लेकिन अविनाश की मौत ने परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया।
परिजनों के अनुसार, सरकारी योजना के तहत दो कमरे मिलने के बावजूद परिवार को दूसरी बुनियादी सुविधाओं के लिए इंतजार करना पड़ा। घर में बिजली कनेक्शन भी अपने खर्च पर करवाना पड़ा। परिवार आज भी टीनशेड और कच्चे आशियानों के सहारे गुजर-बसर कर रहा है। हादसे के बाद पीड़ित परिवार और ग्रामीणों ने प्रशासन से सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने और आर्थिक सहायता उपलब्ध करवाने की मांग की है।
हादसे के बाद समाजसेवी जीतू पूनियां पीड़ित परिवार के घर पहुंचे और परिजनों को ढांढस बंधाया। उन्होंने परिवार के लिए शौचालय निर्माण करवाने की घोषणा भी की। अब परिवार को उम्मीद है कि मासूम की मौत के बाद ही सही, उनके घर में बुनियादी सुविधा उपलब्ध हो सकेगी।
अविनाश की मौत सिर्फ एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि उन सवालों को भी सामने लाती है, जो सरकारी योजनाओं के लाभ और ग्रामीण परिवारों तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचने से जुड़े हैं। सवाल यह है कि जिन सुविधाओं को हर परिवार तक पहुंचाने के दावे किए जाते हैं, वे जरूरतमंद परिवारों तक समय पर क्यों नहीं पहुंच पातीं?