
dsp ramesh akhadiya मंजिल कितनी भी दूर हो, अगर कदम रुकें नहीं तो रास्ते खुद बनते जाते हैं। देवास जिले के छोटे से गांव पांडूतालाब के रमेश अखाडिय़ा की जिंदगी इस बात की मिसाल है। कभी स्कूल जाने के लिए कीचड़ भरी सड़कों पर पैदल चलने और परिवार की जरूरतों के लिए मजदूरी करने वाले रमेश ने अभावों के आगे घुटने नहीं टेके, अपना हौसला नहीं खोया। पढ़ाई जारी रखी, संघर्ष किया और आज डीएसपी के पद पर उज्जैन में सेवाएं दे रहे हैं। विश्व आदिवासी दिवस पर रमेश अखाडिय़ा की कहानी बताती है कि सफलता सुविधाओं से नहीं, बल्कि लगातार प्रयास, शिक्षा और संघर्ष के प्रति जिद से हासिल होती है। पांडूतालाब की कच्ची राहों से शुरू हुआ उनका सफर डीएसपी की कुर्सी तक पहुंच चुका है और समाज के युवाओं को राह दिखा रहा है।
रमेश अखाडिय़ा का बचपन गांव की सामान्य सुविधाओं से भी दूर बीता। कक्षा पहली से दसवीं तक की पढ़ाई उन्होंने अपने पैतृक गांव पांडूतालाब में ही की। इसके बाद वर्ष 1998 में उदयनगर से 11वीं की पढ़ाई पूरी की। उस समय पांडूतालाब से उदयनगर तक का रास्ता कच्चा था और बारिश के दिनों में कीचड़ से भर जाता था। लोहाड़ नदी पर बड़ा पुल नहीं था। नदी पर बना छोटा रपटा पहली ही बारिश में डूब जाता था। स्कूल पहुंचने के लिए कई बार नदी पार करते समय कपड़े तक भीग जाते थे।
मुश्किलें रोज सामने आती थीं, लेकिन रमेश और उनके साथियों का हौसला उनसे बड़ा था। कभी पैदल तो कभी पुरानी साइकिल के सहारे वे हर मौसम में स्कूल पहुंचते। परिवार की जिम्मेदारियों के साथ मजदूरी भी करनी पड़ी, लेकिन पढ़ाई का सिलसिला नहीं टूटा। अभाव उनके रास्ते में थे, लेकिन लक्ष्य उनके मन में उससे कहीं ज्यादा मजबूत था। कठिन परिस्थितियों के बावजूद शिक्षा को प्राथमिकता दी और शासकीय सेवा की दिशा में आगे बढ़ते रहे। आज डीएसपी के रूप में उनकी उपलब्धि उन युवाओं के लिए उम्मीद की मिसाल है, जो संसाधनों की कमी के कारण अपने सपनों को छोटा समझने लगते हैं।
रमेश अखाडिय़ा युवाओं से कहते हैं कि घर की जिम्मेदारियों के साथ समय निकालकर शिक्षा पर विशेष ध्यान देना चाहिए। कठिन परिस्थितियों से घबराकर पीछे हटने के बजाय शासकीय सेवाओं की ओर आगे बढऩा चाहिए। उनका मानना है कि एक युवा की सफलता केवल उसके परिवार को नहीं, बल्कि पूरे समाज को आगे बढऩे की प्रेरणा देती है।