धर्म-कर्म

पितृपक्ष में उज्जैन क्यों माना जाता है खास? ज्योतिषाचार्य से जानें रामघाट, सिद्धवट और गयाकोठा में श्राद्ध का महत्व

Ujjain Pitru Paksha importance: श्राद्ध पक्ष में उज्जैन के रामघाट, सिद्धवट और गयाकोठा पर पितृ कर्म के लिए श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। मान्यता है कि यहां तर्पण और पिंडदान से पितरों को मोक्ष मिलता है।
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Oct 06, 2026
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Ujjain Pitru Paksha importance: ज्योतिषाचार्य से जानें रामघाट, सिद्धवट और गयाकोठा में श्राद्ध का महत्व (फोटो सोर्स- Chatgpt)

Ujjain Pitru Paksha importance: महाकाल की नगरी उज्जैन केवल भगवान शिव की आराधना का प्रमुख केंद्र ही नहीं, बल्कि पितृ कर्म और तर्पण के लिए भी विशेष धार्मिक महत्व रखती है। श्राद्ध पक्ष शुरू होते ही यहां रामघाट, सिद्धवट, गयाकोठा सहित विभिन्न स्थानों पर पितरों के निमित्त तर्पण और श्राद्ध करने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु पहुंचते है। ज्योतिषाचार्य पं. अमर डब्बावाला ने बताया कि धार्मिक मान्यता के अनुसार उज्जैन में किए पितृ कर्म से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। यहां काशी के समान ही पुण्य की प्राप्ति होती है।

नई पीढ़ी के लोग पूर्वजों के नाम खोजने आते हैं

ज्योतिषाचार्य पं. अमर डब्बावाला ने बताया लोगों के द्वारा ऑनलाइन तर्पण भी कराया जा रहा है। सिद्धवट के पुरोहित द्वारकाधीश शास्त्री गुलाटी गुरु ने कहा कि पहले पोथी का चलन था, आज भी है। नई पीढ़ी के लोग अपने पूर्वजों के नाम खोजने यहां आते हैं तो उन्हें कंप्यूटर से जानकारी दी जाती है। साथ ही दूर-दराज में रहने वाले परिजन ऑनलाइन ही तर्पण, पिंडदान आदि करा रहे हैं।

उज्जैन में पितृ कर्म का धार्मिक महत्व

काशी और उज्जैन में पितृ कर्म को लेकर विद्वानों की मान्यता है कि इन स्थानों का उल्लेख पुराणों में भी मिलता है। श्राद्ध पक्ष में बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या की बात करें तो प्रतिदिन 2 से 5 हजार लोग उज्जैन के प्रमुख स्थानों पर पहुंचकर अपने पूर्वजों का पिंडदान करते हैं।

रामघाट, सिद्धवट और गयाकोठा तीर्थ की मान्यता

रामघाट वह स्थान है, जहां भगवान श्रीराम ने अपने पिता दशरथ का पिंडदान किया था। इसी आधार पर घाट का नाम रामघाट पड़ा।

सिद्धवट को प्रेत तीर्थ के नाम से जाना जाता है। पितृ पक्ष के अलावा यहां रोज बड़ी संख्या में लोग पितरों के पिंडदान, तर्पण और उत्तर कार्य के लिए आते हैं।

गयाकोठा में सप्तऋषियों के चरण बने हुए हैं। यहां 84 महादेवों में से एक महादेव का स्थान भी है। यहां काशी की तरह ही फल्गु नदी मानी जाती है, जो अब कुंड के रूप में स्थापित है। यहां परिजन अपने पितरों को पिंड अर्पित करते हैं।

Updated on:
06 Oct 2026 12:11 pm
Published on:
06 Oct 2026 12:11 pm