World No Tobacco Day : विश्व तंबाकू निषेध दिवस आज है। डूंगरपुर के घनश्याम स्वर्णकार ने पिता को दिए वचन को निभाने के लिए अपनी दुकान में तंबाकू उत्पादों की हमेशा के लिए 'नो एंट्री कर दी।
World No Tobacco Day : डूंगरपुर जिले के सागवाड़ा उपखंड क्षेत्र के टामटिया गांव के दुकानदार घनश्याम स्वर्णकार ने पिता को दिए एक वचन को निभाने के लिए अपनी दुकान में तंबाकू उत्पादों की हमेशा के लिए 'नो एंट्री कर दी। पिछले सात वर्षों से उनकी दुकान में जहर का एक दाना तक नहीं बिका है। जिसके चलते वे क्षेत्र के लिए नजीर बन चुके हैं। मुख्य चौराहे पर संचालित दुकान पर जब कभी कोई तंबाकू उत्पाद लेने पहुंचता है, तो उसे जवाब यहीं मिलता है कि यहां मौत का सामान नहीं मिलता है। घनश्याम लोगों को नशे से दूर रहने को समझाते भी है।
वर्ष 2019 में पिता के देवलोकगमन के बाद घनश्याम के सामने बड़ी चुनौती थी। डूंगरपुर जिले के सागवाड़ा उपखंड क्षेत्र के टामटिया बस स्टेशन जैसे मुख्य और व्यस्त चौराहे पर उनकी दुकान वर्ष 2000 से संचालित हो रही थी, जहां हर दिन करीब दो हजार का मुनाफा तंबाकू उत्पादों से ही होता था, लेकिन पिता को दिए वचन के आगे उन्होंने एक पल की भी परवाह किए बिना अपनी दुकान से हर तंबाकू सामग्री को हमेशा-हमेशा के लिए हटा दिया।
घनश्याम बताते है कि नशा मुक्ति की यह मूक मुहिम हैं, जिससे में जुड़ा हुआ हूं। दुकान पर चार लोग कार्यरत हैं। चारों नशा नहीं करते हैं। यहां नौकरी के लिए आने वाले को पहले यहीं पूछता हूं कि किसी प्रकार का नशा तो नहीं करते हो। लोगों को भी नशामुक्ति को लेकर समय-समय पर जागरूक करता रहता हूं।
बकौल घनश्याम बात वर्ष 2019 की हैं, जब पिता रूपलाल सोनी जीवन के आखिरी पड़ाव पर थे और एक गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। बरसों से उन्हें तंबाकू और बीड़ी की लत थी। जब डॉक्टरों ने इन चीजों से पूरी तरह दूरी बनाने को कहा, तो अचानक लत छोड़ना उनके लिए असहनीय मानसिक और शारीरिक पीड़ा का कारण बन गया। बिस्तर पर लेटे-लेटे उन्हें यह अहसास हो चुका था कि इस नशे ने न केवल उनके शरीर को खोखला किया, बल्कि जीवन की गाढ़ी कमाई भी छीन ली। उनका मन आत्मग्लानि से भर उठा।
वे नहीं चाहते थे कि जो जहर उनके अपने घर में दुख लेकर आया, वो उनकी दुकान के जरिए किसी और के हंसते-खेलते आंगन में पहुंचे। इसी के चलते पिता ने यह वचन लिया था कि मैं दुकान पर तंबाकू उत्पादों की बिक्री कभी भी न करूं। इसी के चलते पिछले सात वर्षों से यह वचन निभाया जा रहा है।