CBSE Language Rule: सीबीएसई स्कूलों में अब तीसरी भाषा के रूप में भारतीय भाषाओं को कंपलसरी किया जा रहा है। फ्रेंच और जर्मन की जगह संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा मिलेगा। जानिए क्या है सीबीएसई का नया भाषा नियम?
CBSE Three Language Formula 2026: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के स्कूलों में अब भाषा चयन को लेकर बड़े बदलाव की तैयारी चल रही है। नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत 'थ्री-लैंग्वेज फॉर्मूला' को कड़ाई से लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं। इसके तहत अब स्कूलों को फ्रेंच, जर्मन और स्पेनिश जैसी विदेशी भाषाओं के बजाय संस्कृत और अन्य भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं को तीसरी भाषा के रूप में प्राथमिकता देनी होगी।
बता दें, शिक्षा मंत्रालय ने भी साफ कहा है कि सीबीएसई का नया फॉर्मूला पूरी तरह से नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (NEP) 2020 पर आधारित है।
बोर्ड के नए दिशा-निर्देशों के मुताबिक, कक्षा 6 से 8 तक के स्टूडेंट्स के लिए तीन भाषाओं का अध्ययन करना कंपलसरी होगा। इन तीन भाषाओं में से कम से कम दो भाषाएं भारतीय होनी चाहिए। अब तक कई स्कूल दो विदेशी भाषाओं या एक भारतीय और एक विदेशी भाषा का ऑप्शन देते थे, लेकिन अब भारतीय भाषाओं का दबदबा बढ़ेगा। उदाहरण के तौर पर, यदि कोई स्टूडेंट अंग्रेजी और हिंदी पढ़ रहा है, तो तीसरी भाषा के रूप में उसे संस्कृत, तमिल, कन्नड़ या किसी अन्य भारतीय भाषा को सिलेक्ट करना होगा।
नए नियमों का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि विदेशी भाषाएं पूरी तरह बंद हो जाएंगी। स्टूडेंट्स विदेशी भाषाओं को 'एडिशनल सब्जेक्ट' या चौथी भाषा के रूप में पढ़ सकेंगे, लेकिन वे इसे अनिवार्य तीसरी भाषा के ऑप्शन के तौर पर इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे। सीबीएसई का मेन मोटिव स्टूडेंट्स को सांस्कृतिक जड़ों और भारतीय भाषाई विविधता से जोड़ना है। बोर्ड का मानना है कि भारतीय भाषाओं के ज्ञान से ब्चचों का मानसिक और सांस्कृतिक विकास बेहतर होगा।
सीबीएसई के इस फैसले से निजी स्कूल प्रबंधन के सामने शिक्षकों की उपलब्धता को लेकर संकट खड़ा हो गया है। कई स्कूलों में पिछले कई सालों से केवल विदेशी भाषाओं के टिचर्स ही तैनात थे। अब अचानक संस्कृत या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के टिचर्स को अपॉइंट करना और उनके लिए बजट अलॉट करना स्कूलों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। अभिभावकों का एक वर्ग भी इस फैसले को लेकर बंटा हुआ है। कुछ इसे भारतीय संस्कृति के लिए अच्छा मान रहे हैं, तो कुछ को लगता है कि इससे ग्लोबल करियर की राह में ब्चचों को बाधा आ सकती है।
इस नियम के लागू होने से संस्कृत के साथ ही देश की अन्य समृद्ध क्षेत्रीय भाषाओं जैसे मराठी, बंगाली, गुजराती और साउथ इंडियन भाषाओँ के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। सरकार का जोर इस बात पर है कि स्टूडेंट्स अपनी मातृभाषा और देश की अन्य भाषाओं को सम्मान दें। आने वाले एकेडमिक सेशन से स्कूलों को इस नए सिलेबस के मुताबिक अपनी समय-सारणी और टीचर मैनेजमेेंट में बदलाव करना होगा।