
Bihar NewsNEET पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था को लेकर देशभर में छात्रों का गुस्सा देखने को मिल रहा है। इसी बीच बिहार के गया जिले के टिकारी प्रखंड स्थित सिमुआरा मध्य विद्यालय के बच्चों ने भी अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए आवाज बुलंद की। छठी से आठवीं कक्षा के दर्जनों छात्र स्कूल में पीने का साफ पानी, बेहतर मिड-डे मील, शौचालय, बिजली, पंखे, यूनिफॉर्म और नियमित पढ़ाई जैसी मूलभूत सुविधाओं की मांग को लेकर करीब चार किलोमीटर पैदल चलकर अनुमंडल कार्यालय (SDM कार्यालय) पहुंच गए।
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में बच्चे SDM कार्यालय के बाहर जमीन पर बैठे नजर आए। उनका कहना था कि जब तक उनकी समस्याओं का समाधान नहीं होगा, वे वहां से नहीं हटेंगे। छोटे-छोटे बच्चों का यह शांतिपूर्ण विरोध शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत को सामने लाने वाला था।
मामला सामने आने के बाद टिकारी के SDM प्रवीण कुंदन ने स्कूल की स्थिति की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की। समिति में सहायक जिला आपूर्ति पदाधिकारी चंदन कुमार, कार्यपालक पदाधिकारी रंजीत सिंह और प्रखंड विकास पदाधिकारी योगेंद्र पासवान को शामिल किया गया। टीम को स्कूल का निरीक्षण कर विस्तृत रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया।
इसके अगले दिन जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (प्रारंभिक शिक्षा एवं समग्र शिक्षा) नित्यम कुमार गौरव और प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी डॉ. अभय कुमार रमन ने भी विद्यालय का औचक निरीक्षण किया। अधिकारियों ने बच्चों से सीधे बातचीत कर उनकी शिकायतें सुनीं और स्कूल प्रशासन को सात दिनों के भीतर व्यवस्था सुधारने का निर्देश दिया।
निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने कक्षाओं की पढ़ाई, मिड-डे मील की गुणवत्ता, साफ-सफाई, बिजली, पंखों और शौचालय जैसी सुविधाओं की समीक्षा की। स्कूल को तत्काल सफाई, मरम्मत, पौष्टिक भोजन, बिजली की वायरिंग पूरी कराने, सभी कमरों में पंखे लगाने और नियमित रूप से कक्षाएं संचालित करने के निर्देश दिए गए।
बच्चों के प्रदर्शन के बाद शिक्षा विभाग ने अनुशासनात्मक कार्रवाई भी शुरू कर दी। ब्लॉक शिक्षा पदाधिकारी ने हेडमास्टर को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा कि आखिर पढ़ाई के समय बच्चे चार किलोमीटर दूर प्रदर्शन करने कैसे पहुंच गए? नियमित पढ़ाई क्यों नहीं हो रही थी? मिड-डे मील में कीड़े मिलने की शिकायतों पर क्या कार्रवाई की गई? और विभागीय निर्देशों के बावजूद छात्रों को शैक्षणिक भ्रमण पर क्यों नहीं ले जाया गया?
नोटिस में कहा गया कि ये परिस्थितियां विद्यालय संचालन में गंभीर लापरवाही का संकेत देती हैं और इससे पूरे शिक्षा विभाग की छवि प्रभावित हुई है। हेडमास्टर को 24 घंटे के भीतर जवाब देने का निर्देश दिया गया है। साथ ही, संतोषजनक स्पष्टीकरण मिलने तक प्रदर्शन वाले दिन का वेतन रोक दिया गया है।
इसी तरह सात अन्य शिक्षकों को भी नोटिस जारी कर पूछा गया कि उन्होंने छात्रों की बढ़ती नाराजगी और स्कूल की समस्याओं की जानकारी समय रहते विभाग को क्यों नहीं दी। नोटिस में यह भी कहा गया कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि वे बच्चों के विरोध के प्रति अप्रत्यक्ष रूप से सहानुभूति रखते थे। सभी शिक्षकों को 24 घंटे के भीतर जवाब देने का निर्देश दिया गया है और उनका भी उस दिन का वेतन फिलहाल रोक दिया गया है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जब छोटे-छोटे बच्चों को अपनी बुनियादी सुविधाओं के लिए स्कूल छोड़कर सड़कों पर उतरना पड़े, तो शिक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी आखिर किसकी है।