जुड़वां गांव के नाम से जाना जाता है गाजियाबाद का अटौर-नंगला, करीब 60 जुड़वां बच्‍चे मौजूद हैं इस समय
गाजियाबाद। दिलीप कुमार की फिल्म राम और श्याम हो या फिर सलमान खान की जुड़वां। लोगों को ये फिल्में हमेशा आकर्षित करती हैं। इनमें ट्विंस की कहानी है। आज हम आपको ऐसे गांव के बारे में बताएंगे, जो जुड़वां बच्चों का गांव कहलाता है। दावा जाता है कि यहां पर काफी साल से ज्यादातर जुड़वां बच्चे ही जन्म ले रहे हैं। अधिकतर बच्चों की शक्ल-सूरत एक जैसी है। इससे माता-पिता और टीचर्स को भी कंफ्यूजन हो जाता है।
सगे भाइयो ने बसाया था गांव
बताया जाता है कि इस समय करीब 60 जुड़वां बच्चे गांव के अंदर मौजूद हैं। सभी स्वस्थ हैं। कहा जाता है कि ये दो गांव थे, जिन्हें काफी पहले दो सगे भाइयों साेनू मल अौर मोलू मल के द्वारा बसाया गया था। उसके बाद से ही यहां जुड़वां बच्चे पैदा हो रहे हैं। अब इन दोनों गांवों को भी एक ही माना जाता है। इसे लोग जुड़वां गांव कहने लगे हैं।
किसी को नहीं पता वजह
गाजियाबाद में अटौर-नंगला गांव की आबादी करीब 6200 है। इनमें जाट से लेकर ब्राह्मण और बाल्मीकि समाज तक के लोग रहते हैं। गांव में विकास भी हुआ है। वाईफाई कनेक्शन से लेकर सोलर लाइट तक लगी हुई हैं। गांव के कुछ घरों में एसी भी है लेकिन यहां जुड़वां बच्चे होने के पीछे की वजह किसी को पता नहीं है।
स्कूल की शर्ट पर लिख दिए दोनों के नाम
गांव में रहने वाले अर्पित और आर्यन दोनों 10 साल के हैं। वे स्कूल में पांचवीं क्लास के छात्र हैं। उनकी शक्ल इतनी मिलती है कि कई बार घर वाले भी धोखा खा जाते हैं। अर्पित और आर्यन की मां मंजू का कहना है कि एक बार उन्होंने अर्पित को दूध पीने को कहा तो उसने मना कर दिया। थोड़ी देर बाद गलती से उन्होंने आर्यन को डांट लगा दी। स्कूल की टीचर भी उन्हें देखकर कई बार गलती कर बैठती थी। वह दोनों की शर्ट पर उनके नाम लिख देती थी। अगर दोनों एक से कपड़े पहन लेें तो इनकी पहचान करनी मुश्किल है। उनका कहना है कि गांव में काफी सारे जुड़वां बच्चे हैं। बाहर से आने वाले लोग कहते हैं उनके गांव में यह रीत चली आ रही है कि सब जुड़वां होते हैं।
चाचा भी हैं जुड़वां
अर्पित और आर्यन के चाचा भी जुड़वां ही हैं। सोविंदर और रविंद्र दोनों किसान हैं। दोनों की शक्ल-सूरत बचपन में काफी ज्यादा मिलती थी। हालांकि, बड़े होते-होते सूरत थोड़ी सी बदल गई। सोविंदर ने मूछें रख ली जबकि दूसरे भाई ने मूंछ नहीं रखी। सोविंदर ने बताया कि उनके और भाई में आधे घंटे का फर्क है। बड़े होने पर दोनों में थोड़ा बदलाव हुआ तो लोगों को पहचानने में आसानी हुई। गांव के लोग इतना धोखा खा जाते थे कि एक की उधारी दूसरे से मांगने लगते थे।
मां को भी हुई मुश्किल
गांव में रहने वाले प्रशांत और सुशांत भी जुड़वां हैं। दोनों 11वीं क्लास के स्टूडेंट हैं और गाजियाबाद के एक स्कूल में पढ़ते हैं। इनकी टीचर कई बार धोखा खा जाती हैं। उनकी मां राजकुमारी का कहना है कि यहां कई लोग जुड़वां हैं। उनके पड़ोस में जुड़वां बच्चे हैं। उनके देवरानी के भी जुड़वां बच्चे हुए थे लेकिन वे जिंदा नहीं रह पाए। उनका कहना है कि उन्हें भी कई बार दोनों की पहचान करने में कई बार मुश्किल हो जाती है। प्रशांत व सुशांत का कहना है कि भैया भी कई बार उन्हें गलत नाम से बुला लेते हैं। बाहर से आने वाले लोगों को यह देखकर हैरानी होती है। सुशांत का कहना है कि दोनों अगल-अलग क्लास में बैठते हैं। टीचर भी उन्हें देखकर कंफ्यूज हो चुकी हैं।
एक है हेल्दी तो दूसरा पतला
गांव के ही अमित और आयुष 7 साल के हैं। इनकी मां ममता का कहना है कि उन्हें दोनों को पहचानने में कोई ज्यादा दिक्कत नहीं हुई है। इनमें से एक थोड़ा हेल्दी जबकि दूसरा पतला है।
इलाहाबाद के गांव में भी होते हैं जुड़वां बच्चे
आपको बता दें कि गाजियाबाद के अटौर-नंगला के अलावा यूपी का एक और गांव जुड़वां बच्चों के लिए जाना जाता है। वह है इलाहाबाद का रहीमाबाद उमरी। इस गांव में ऐसा क्यों होता है, इसका रहस्य भी आज तक कोई समझ नहीं सका है।