ग्वालियर

Gwalior news: तलाक का हकदार नहीं हो सकता ‘वर्चस्ववादी सोच’ रखने वाला पुरुष, हाइकोर्ट का फैसला

Gwalior news: हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला सही ठहराया, वर्चस्ववादी पति सिर्फ शादी टूटने का हवाला देकर तलाक नहीं ले सकता।
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हाइकोर्ट का फैसला:divorce petition (Photo Source - freepik)
हाइकोर्ट का फैसला:divorce petition (Photo Source - freepik)

Gwalior High Court: एमपी में ग्वालियर हाईकोर्ट की डबल बेंच ने फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि कोई पति जो खुद वर्चस्ववादी रवैया रखता हो और पत्नी पर हावी होने की कोशिश करता हो, वह केवल शादी के टूटने का हवाला देकर तलाक का हकदार नहीं हो सकता। कोर्ट ने पाया कि विवाह के समय दोनों बेरोजगार थे। 1989 में जब पत्नी का चयन पुलिस बल में हुआ, तो पति ने उसे नौकरी छोड़ने या मनमाफिक ट्रांसफर कराने के लिए दबाव बनाया।

कोर्ट ने कहा कि पुलिस बल में सेवा गर्व की बात है, लेकिन पति ने इसे स्वीकार करने के बजाय अपनी पत्नी पर दबदबा बनाने की कोशिश की। पति ने आरोप लगाया कि पत्नी उसके साथ मारपीट करती थी। हाईकोर्ट ने इसे पूरी तरह अविश्वसनीय माना और कहा कि अपनी पत्नी के करियर का फैसला खुद करने की सोच रखने वाला हावी रहने वाला पुरुष पत्नी द्वारा शारीरिक उत्पीड़न का शिकार हुआ हो, यह गले नहीं उतरता।

दायर की थी तलाक याचिका

ग्वालियर निवासी धर्मेंद्र व रेखा (दोनों के परिवर्तित नाम) का विवाह 09 मई 1987 को हुआ था और दोनों के चार बच्चे हैं। दोनों सरकारी सेवा में अलग-अलग विभागों में कार्यरत है और ग्वालियर में ही अलग-अलग मकानों में रह रहे हैं। पति ने क्रूरता और परित्याग के आधार पर कुटुंब न्यायालय (फैमिली कोर्ट) ग्वालियर में तलाक की याचिका दायर की थी, जिसे 9 जनवरी 2014 को को खारिज कर दिया गया था। इसके खिलाफ पति ने हाईकोर्ट में प्रथम अपील दायर की थी।

परित्याग का झूठा दावा

पति ने कहा कि वे 2006 से अलग रह रहे हैं, जबकि जिरह में स्वीकार किया कि वह 2009 में भी अपनी पत्नी के साथ सरकारी आवास में रहा था। जब पत्नी ने साथ रहने की इच्छा जताई, तो पति ने इनकार कर दिया। पति की ओर से तर्क दिया गया कि अब शादी पूरी तरह टूट चुकी है और सुलह असंभव है। कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत शादी का अपरिवर्तनीय रूप से टूटना अपने आप में तलाक का आधार नहीं है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत शादी को समाप्त करने का यह असाधारण अधिकार केवल देश के सर्वोच्च न्यायालय के पास है, हाईकोर्ट के पास नहीं।

Updated on:
09 Aug 2026 10:50 am
Published on:
09 Aug 2026 10:50 am