
Hanumangarh Drug Menace: जब नशे की आहट पहली बार मोहल्ले तक पहुंची थी, तब मांओं ने इसके खतरे को पहचान लिया था। वे पुलिस थाने और एसपी कार्यालय तक पहुंचीं। हाथ जोड़कर कहा, नशा बेचने वालों को रोक लीजिए, नहीं तो हमारे बच्चे बर्बाद हो जाएंगे। मगर उनकी फरियाद फाइलों और आश्वासनों में दबकर रह गई।
आज वही माताएं अपने जवान बेटों की तस्वीर देखकर फूट-फूटकर रोती हैं। हनुमानगढ़ जंक्शन थाने और एसपी कार्यालय से कुछ ही दूरी पर स्थित भट्टा कॉलोनी इसका दर्दनाक उदाहरण है। जहां कई परिवारों के कमाऊ बेटे नशे की भेंट चढ़ चुके हैं और कई अब भी इसकी गिरफ्त में हैं। खून के आंसू पीती मांएं यहीं कहती हैं, साहब…नशा हमारे बच्चों को खा गया।
17 सितंबर 2024 को आमने-सामने रहने वाले दो परिवारों पर एक साथ मातम छा गया। लखन और सुमित की एक ही दिन नशे से मौत हो गई। दोनों घर आज भी उस दिन की खामोशी और चीखों की गवाही देते हैं। मांओं का सवाल, जिसका जवाब अब भी बाकी है। अगर उसी समय हमारी बात सुन ली जाती, नशा बेचने वालों पर सख्ती होती और बच्चों का इलाज कराया जाता, तो क्या हमारे बेटे आज जिंदा नहीं होते…? यह सवाल सिर्फ भट्टा कॉलोनी की माताओं का नहीं, बल्कि उन तमाम परिवारों का है, जिनकी गोद और आंगन नशे ने उजाड़ दिए।
विधि विशेषज्ञों के अनुसार, नशे की ओवरडोज से मौत के अधिकांश मामले कॉज ऑफ डेथ रिकॉर्ड में ही नहीं आ पाते हैं। पहली वजह तो यह कि परिजन पोस्टमॉर्टम नहीं करवाते। पोस्टमॉर्टम कराते भी हैं, तो मर्ग दर्ज होने के कारण पुलिस जांच रिपोर्ट में ज यादा रुचि नहीं लेती। विसरा, एफएसएल आदि सैंपल जो जांच के लिए भेजे जाते हैं, उनकी रिपोर्ट ही 6 से 9 माह में आती है। फिर रिपोर्ट लेकर पुलिस को पुनः उसी मेडिकल ज्यूरिस्ट के पास जाना होता है, जो जांच रिपोर्ट का विश्लेषण कर कॉज ऑफ डेथ बताता है। महीनों बाद रिकॉर्ड अपडेट करनी की मशक्कत कोई नहीं करता, ऐसे में नशे से मौत का कोई आंकड़ा रिकॉर्ड में नहीं आ पा रहा है।
नसीब कौर के इकलौते बेटे गुरमीत (22) की अप्रैल 2022 में नशे के ओवरडोज से मौत हो गई। सात साल की मन्नतों और दुआओं के बाद जन्मा था। उसकी शादी हो चुकी थी, लेकिन गलत संगत ने उसे नशे की गिरफ्त में धकेल दिया। कौर ने कहा कि हमने दो-तीन बार जंक्शन थाने और एसपी कार्यालय के बाहर प्रदर्शन कर नशा बेचने वालों पर कार्रवाई और नशा पीड़ित युवाओं के इलाज की मांग की थी।
धोबन देवी का 22 वर्षीय बेटा लखन सितंबर 2024 में नशे के कारण दुनिया छोड़ गया। वे बताती हैं कि वे कई बार पुलिस के पास शिकायत लेकर गईं, लेकिन कार्रवाई की जगह अभद्र व्यवहार मिला। बेटे को बचाने के लिए वह उसके पीछे-पीछे घूमती रहीं, मगर नशे की लत उससे ज्यादा मजबूत साबित हुई। बेटे की मौत का सदमा ऐसा लगा कि पति की आंखों की रोशनी तक चली गई।
घरों में साफ-सफाई कर परिवार चलाने वाली इंदिरा देवी ने पति की मौत के बाद अकेले ही बेटे सुमित (21) और दो बेटियों का पालन-पोषण किया। उन्हें भरोसा था कि बेटा बुढ़ापे का सहारा बनेगा, लेकिन सितंबर 2024 में नशे ने उसे भी छीन लिया। बेटी ज्योति कहती हैं, भाई के जाने के बाद मां हंसना तक भूल गई हैं। चुपचाप काम करती रहती हैं और अचानक उनकी आंखें भर आती हैं।
शहर के भट्टा कॉलोनी व खुजा क्षेत्र में नशे की बढ़ती शिकायतों के चलते डोर टू डोर शहर के भारत में लिप्त लोगों को चिह्नित कर कार्रवाई की जा रही है। नागरिकों से भी सहयोग की अपील की गई है।
नरेंद्र सिंह मीणा, जिला पुलिस अधीक्षक