
Fasting During Pregnancy: गर्भावस्था (Pregnancy) एक ऐसा खूबसूरत और नाजुक दौर होता है जब होने वाली मां का पूरा ध्यान अपने होने वाले बच्चे की सेहत पर होता है। हमारे देश और दुनिया के कई हिस्सों में धार्मिक, सांस्कृतिक या व्यक्तिगत कारणों से महिलाएं व्रत या उपवास (Fasting) रखती हैं। लेकिन अक्सर प्रेग्नेंट महिलाओं के मन में यह सवाल जरूर आता है कि क्या गर्भावस्था में उपवास रखने से पेट में पल रहे बच्चे की सेहत पर कोई बुरा असर पड़ेगा? क्या इससे बच्चे का जन्म के समय वजन कम हो सकता है?
अगर आपके मन में भी यह सवाल उठ रहा है, तो हाल ही में आई एक बहुत बड़ी और व्यापक रिसर्च ने इसका वैज्ञानिक जवाब दिया है। 13 लाख से भी ज्यादा गर्भावस्थाओं पर किए गए एक विशाल अध्ययन (Study) में यह देखा गया कि प्रेग्नेंसी के दौरान उपवास रखने से बच्चे के जन्म के वजन (Birth Weight) पर क्या और कितना प्रभाव पड़ता है। आइए समझते हैं कि इस रिसर्च के नतीजे क्या कहते हैं और गर्भवती महिलाओं को इस दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।
नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के मुताबिक, 2004 से जून 2025 तक (PubMed, Scopus, Web of Science) पर गर्भावस्था और फास्टिंग के रिश्ते को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने 13 लाख से अधिक गर्भवती महिलाओं के डेटा और रिकॉर्ड्स का गहराई से विश्लेषण किया। इस रिसर्च का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना था कि क्या गर्भावस्था के दौरान मां का उपवास रखना बच्चे के वजन, जन्म के समय (Gestational Age) या समय से पहले डिलीवरी (Preterm Birth) के जोखिम को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। इतने बड़े पैमाने पर किए गए अध्ययन के नतीजे स्वास्थ्य जगत और गर्भवती महिलाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं, क्योंकि इसमें विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की महिलाओं को शामिल किया गया था।
अध्ययन के आंकड़ों से जो मुख्य बात सामने आई, वह यह है कि गर्भावस्था में उपवास रखने से बच्चे के जन्म के औसतन वजन में बहुत मामूली या न के बराबर (Minimal) फर्क देखने को मिला। शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन महिलाओं ने गर्भावस्था के दौरान उपवास रखा, उनके नवजात बच्चों का वजन उन महिलाओं के बच्चों की तुलना में थोड़ा सा कम था जिन्होंने उपवास नहीं रखा था। हालांकि, यह अंतर इतना छोटा था कि इसे मेडिकल तौर पर बहुत ज्यादा नुकसानदायक या खतरनाक नहीं माना गया। अधिकतर मामलों में बच्चे का वजन सामान्य और सुरक्षित सीमा के भीतर ही रहा।
रिसर्च में इस बात का भी बारीकी से अध्ययन किया गया कि महिला ने गर्भावस्था के किस महीने या किस तिमाही (Trimester) में उपवास रखा था;
जब कोई गर्भवती महिला उपवास रखती है, तो उसके शरीर का मेटाबॉलिज्म तेजी से बदलता है। सामान्य व्यक्ति की तुलना में प्रेग्नेंट महिला के शरीर को लगातार ऊर्जा (Glucose) और पोषक तत्वों की जरूरत होती है क्योंकि पेट में पल रहा बच्चा सीधे तौर पर मां के खून से पोषण लेता है। जब मां लंबे समय तक कुछ नहीं खाती, तो शरीर में ब्लड शुगर का स्तर गिरने लगता है और शरीर में 'कीटोन्स' (Ketones) बनने लगते हैं। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे, तो मां को बहुत ज्यादा कमजोरी, चक्कर आना, डिहाइड्रेशन (पानी की कमी) और एसिडिटी जैसी परेशानियां हो सकती हैं, जो अप्रत्यक्ष रूप से बच्चे की सेहत को प्रभावित कर सकती हैं।
वैज्ञानिक शोध भले ही यह दिखाता है कि ज्यादातर मामलों में इसका असर बहुत गंभीर नहीं होता, लेकिन फिर भी डॉक्टरों का मानना है कि हर महिला की प्रेग्नेंसी अलग होती है। यदि कोई गर्भवती महिला उपवास रखना चाहती है, तो उपवास रखने से पहले अपनी गायनाकोलॉजिस्ट (Gynecologist) से बात करें। अगर आपकी प्रेग्नेंसी 'हाई रिस्क' (High Risk) है, जैसे डायबिटीज, हाई बीपी, खून की कमी या बच्चे का विकास पहले से धीमा है, तो उपवास रखने से बचें।अगर आपके उपवास में पानी पीने की अनुमति है, तो पानी, नारियल पानी, लस्सी या ताजा जूस पिएं ताकि शरीर में पानी की कमी (Dehydration) न हो।
जब भी उपवास खोलें या खाएं, तो तली-भुनी चीजों की जगह फल, हरी सब्जियां, दूध, मेवे (Dry Fruits) और प्रोटीन से भरपूर चीजें खाएं। यदि उपवास के दौरान आपको बहुत ज्यादा चक्कर आए, आंखों के आगे अंधेरा छाए, बच्चा पेट में कम हिलता-डुलता महसूस हो या बहुत ज्यादा कमजोरी लगे, तो तुरंत उपवास तोड़ें और डॉक्टर से संपर्क करें।