
Gender Dysphoria Symptoms: आजकल के दौर में मानसिक स्वास्थ्य और हमारी पहचान से जुड़े कई ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर लोग खुलकर बात करने लगे हैं। इन्हीं में से एक गंभीर विषय है जेंडर डिस्फोरिया (Gender Dysphoria)। कई लोग इसे सिर्फ एक पसंद या अजीब व्यवहार समझकर टाल देते हैं, लेकिन डॉक्टरी और मानसिक स्वास्थ्य की नजर से देखें तो यह एक बहुत ही संवेदनशील और गहरी बात है। अमेरिकन साइकियाट्रिक एसोसिएशन (APA) की रिपोर्ट के आधार देखें तो जब किसी इंसान का शरीर जिस लिंग (सेक्स) में पैदा हुआ है और अंदर से वह जो खुद को महसूस करता है, उन दोनों के बीच एक बड़ी दूरी आ जाती है तब जो भयानक दिमागी खिंचाव और बेचैनी पैदा होती है, उसे ही जेंडर डिस्फोरिया कहते हैं।
मेयो क्लिनिक के अनुसार, जब कोई बच्चा पैदा होता है, तो डॉक्टर उसकी शारीरिक बनावट को देखकर कह देते हैं कि यह लड़का है या लड़की। लेकिन जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, उसके दिमाग में खुद को लेकर एक अलग अहसास बनता है कि वह अंदर से क्या है इसे हम जेंडर पहचान कहते हैं। अब मान लीजिए, किसी का शरीर तो पुरुष का है, लेकिन अंदर से उसकी आत्मा या अहसास बिल्कुल एक औरत का है। ऐसे में शरीर और मन के बीच एक जंग सी छिड़ जाती है। इसी तालमेल की कमी से जो रोज-रोज की घुटन, चिड़चिड़ापन और भारी मानसिक तनाव पैदा होता है, वही जेंडर डिस्फोरिया है। कोई ट्रांसजेंडर है या अपनी पहचान अलग मानता है, तो इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि वह मानसिक रूप से बीमार है। असल बीमारी या परेशानी वह मानसिक दर्द और घुटन है, जो इस अंतर के कारण उस इंसान को सहनी पड़ती है।
अमेरिकन साइकियाट्रिक एसोसिएशन की गाइडलाइन (DSM-5) साफ कहती है कि सिर्फ अलग कपड़े पहनने या अलग तरह से रहने भर से किसी को जेंडर डिस्फोरिया का मरीज नहीं मान लिया जाता। इसे डॉक्टरी या मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति तब माना जाता है, जब ये बातें दिखने लगें;
यह परेशानी बचपन से भी दिख सकती है और किशोरावस्था (Teenage) या बड़े होने पर भी सामने आ सकती है। इसके कुछ आम लक्षण ये हैं;
जेंडर डिस्फोरिया से जूझ रहे इंसान को अगर सही वक्त पर अपनों का प्यार, भरोसा और डॉक्टरी सलाह न मिले, तो उसकी हालत बिगड़ सकती है। मेयो क्लिनिक के मुताबिक;