
Diabetes History In Hindi : क्या आपको लगता है कि डायबिटीज (Sugar) आज के दौर की आधुनिक बीमारी है? अगर हां, तो आप पूरी तरह सही नहीं हैं। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इस बीमारी का इतिहास आज का नहीं, बल्कि करीब 3500 साल पुराना है। जब इंसानों को ठीक से चिकित्सा विज्ञान (Medical Science) की समझ भी नहीं थी, तब से यह बीमारी लोगों को अपनी चपेट में ले रही है। आइए डायबिटीज रिसर्च कनेक्शन और नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के अनुसार, समझते हैं कि हजारों साल पहले इस बीमारी का पता कैसे चला था और क्यों इसका नाम डायबिटीज पड़ा।
इस बीमारी का सबसे पहला लिखित प्रमाण करीब 1500 ईसा पूर्व (यानी आज से लगभग 3500 साल पहले) मिस्र (Egypt) में मिला था। वहां एबर्स पेपिरस (Ebers Papyrus) नाम के एक प्राचीन मेडिकल दस्तावेज में एक अजीब बीमारी का जिक्र किया गया था। इसमें बताया गया था कि कुछ लोगों को ऐसी बीमारी हो रही है, जिसमें उनका वजन बहुत तेजी से घट जाता है और उन्हें बहुत ज्यादा पेशाब आता है। उस दौर के वैद्यों और डॉक्टरों के लिए यह बेहद हैरान करने वाली बात थी।
प्राचीन काल में आज की तरह ब्लड टेस्ट या यूरिन टेस्ट करने के लिए बड़ी-बड़ी मशीनें और लैब नहीं हुआ करती थीं। ऐसे में इस बीमारी की पहचान का तरीका बेहद दिलचस्प और थोड़ा हैरान करने वाला था।
भारत के महान चिकित्सक महर्षि सुश्रुत और चरक (करीब 500-600 ईसा पूर्व) ने ध्यान दिया कि कुछ लोगों के पेशाब की तरफ चींटियां बहुत ज्यादा आकर्षित होती हैं। उन्होंने पाया कि इस बीमारी से पीड़ित मरीजों के यूरिन में एक अजीब सा मीठापन होता है। इसी वजह से प्राचीन भारत में इस बीमारी को मधुमेह नाम दिया गया, जिसका सीधा मतलब होता है शहद जैसा पेशाब। ठीक इसी तरह की पहचान प्राचीन काल में चीन और जापान के डॉक्टरों ने भी की थी।
समय बीतने के साथ इस बीमारी को एक सटीक नाम मिला। ग्रीक (यूनान) के एक मशहूर चिकित्सक एरेटियस (Aretaeus) ने इसे डायबिटीज नाम दिया। ग्रीक भाषा में डायबिटीज का मतलब होता है 'साइफन' (Siphon) या 'आर-पार बहना'। उन्होंने देखा कि इस बीमारी में मरीज जो भी पानी पीता है, वह शरीर में टिकने के बजाय तुरंत पेशाब के रास्ते बाहर निकल जाता है, मानो शरीर एक पाइप या साइफन बन गया हो।
इसके सदियों बाद, 1600 के दशक में एक ब्रिटिश डॉक्टर थॉमस विलिस ने इसके आगे मेलिटस (Mellitus) शब्द जोड़ा। 'मेलिटस' एक लैटिन शब्द है जिसका मतलब होता है 'शहद जैसा मीठा'। इस तरह इसका पूरा नाम डायबिटीज मेलिटस पड़ा, जिसका सीधा सा अर्थ था शरीर से मीठे पानी का अत्यधिक बहना।
शुरुआती दौर में डायबिटीज का कोई ठोस इलाज नहीं था। अगर किसी को टाइप-1 डायबिटीज हो जाती थी, तो उसकी मौत लगभग तय मानी जाती थी। डॉक्टरों के पास मरीजों को भूखा रखने या बेहद कम कैलोरी देने के अलावा कोई रास्ता नहीं था।
लेकिन साल 1921 में मेडिकल साइंस की दुनिया में एक बड़ा चमत्कार हुआ। कनाडा के वैज्ञानिक फ्रेडरिक बैंटिंग और चार्ल्स बेस्ट ने इंसुलिन की खोज की। इस खोज ने डायबिटीज के मरीजों को एक नई जिंदगी दी। इंसुलिन की खोज के लिए इन्हें नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।
डिस्क्लेमरः इस लेख में दी गई जानकारी का उद्देश्य केवल रोगों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के प्रति जागरूकता लाना है। यह क्वालीफाइड मेडिकल ऑपिनियन का विकल्प है। लेकिन पाठकों को सलाह दी जाती है कि वह कोई भी दवा, उपचार या नुस्खे को अपनी मर्जी से ना आजमाएं बल्कि इस बारे में उस चिकित्सा पैथी से संबंधित एक्सपर्ट या डॉक्टर की सलाह जरूर ले लें।