स्वास्थ्य

Anaemia in India: भारत की सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं में से एक एनीमिया, फिर NFHS-6 से क्यों गायब हुआ डेटा?

Anaemia Mukt Bharat: NFHS-6 फैक्ट शीट में एनीमिया का डेटा शामिल नहीं किया गया है। जानिए विशेषज्ञ इसे क्यों चिंताजनक मान रहे हैं और इसका महिलाओं व बच्चों की सेहत पर क्या असर पड़ सकता है।

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Jun 07, 2026
Anaemia in India NFHS-6 report Anaemia Mukt Bharat
एनीमिया से पीड़ित बच्ची की प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo- freepik)

NFHS-6 report: भारत में एनीमिया (खून की कमी) लंबे समय से एक बड़ी स्वास्थ्य समस्या रहा है। खासकर महिलाओं, गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों में यह समस्या काफी आम है। ऐसे में जब ⁠राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6) की फैक्ट शीट जारी हुई, तो स्वास्थ्य विशेषज्ञों की नजर एक बड़ी कमी पर गई, इस बार रिपोर्ट में एनीमिया से जुड़ा डेटा शामिल नहीं किया गया है।

यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछली NFHS-5 रिपोर्ट में एनीमिया के बढ़ते मामलों को लेकर चिंता जताई गई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 15 से 49 साल की 57% महिलाएं और 6 से 59 महीने के 67.1% बच्चे एनीमिया से प्रभावित थे। इतना ही नहीं, गर्भवती महिलाओं में भी एनीमिया का आंकड़ा 52.2% तक पहुंच गया था।

आखिर NFHS-6 से एनीमिया का डेटा क्यों हटाया गया?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, विशेषज्ञों ने NFHS की पुरानी जांच पद्धति पर सवाल उठाए थे। पहले सर्वे में एनीमिया की जांच के लिए उंगली से खून की बूंद (Finger-Prick Test) ली जाती थी। कुछ वैज्ञानिकों का मानना था कि इस तरीके से एनीमिया के मामले वास्तविक संख्या से ज्यादा दिख सकते हैं।

इसी वजह से अब अधिक सटीक मानी जाने वाली वेनस ब्लड टेस्टिंग (Venous Blood Testing) यानी नस से खून लेकर जांच करने की पद्धति अपनाई जा रही है। इस नई पद्धति से जुटाया गया डेटा राष्ट्रीय पोषण संस्थान (National Institute of Nutrition - NIN) की आहार और बायोमार्कर सर्वेक्षण (Diet and Biomarker Survey) रिपोर्ट में जारी होने की उम्मीद है।

विशेषज्ञ क्यों जता रहे हैं चिंता?

विशेषज्ञों का कहना है कि जांच का तरीका बदलना अच्छी बात है, लेकिन इससे डेटा में खालीपन नहीं आना चाहिए। ⁠पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर पूनम मुटरेजा के अनुसार, एनीमिया भारत की सबसे गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि सरकार की एनीमिया मुक्त भारत (Anaemia Mukt Bharat) जैसी योजनाएं वास्तव में कितना असर दिखा रही हैं। उनका कहना है कि अगर सर्वे की पद्धति बदली गई है तो पुराने और नए डेटा के बीच तुलना करने के लिए "ब्रिज एस्टिमेट" भी जारी किए जाने चाहिए थे।

सिर्फ आयरन की गोलियां बांटने का डेटा काफी नहीं

NFHS-6 में गर्भवती महिलाओं को आयरन-फोलिक एसिड सप्लीमेंट मिलने की जानकारी तो दी गई है, लेकिन यह नहीं बताया गया कि इससे एनीमिया के मामलों में कितनी कमी आई। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि केवल यह जान लेना काफी नहीं कि कितनी गोलियां बांटी गईं। असली सवाल यह है कि लोगों की सेहत में सुधार हुआ या नहीं।

क्यों है यह मामला अहम?

एनीमिया सिर्फ खून की कमी नहीं है। यह गर्भावस्था, नवजात शिशु के स्वास्थ्य, बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास, पढ़ाई की क्षमता और काम करने की उत्पादकता तक को प्रभावित कर सकता है। यही वजह है कि विशेषज्ञ NFHS-6 की पूरी रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि अंतिम रिपोर्ट में एनीमिया से जुड़े आंकड़े और नई जांच पद्धति की पूरी जानकारी दी जाएगी। क्योंकि किसी भी स्वास्थ्य समस्या से लड़ने का पहला कदम है, उसे सही तरीके से मापना और समझना।

डिस्क्लेमरः इस लेख में दी गई जानकारी का उद्देश्य केवल रोगों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के प्रति जागरूकता लाना है। यह क्वालीफाइड मेडिकल ऑपिनियन का विकल्प है। लेकिन पाठकों को सलाह दी जाती है कि वह कोई भी दवा, उपचार या नुस्खे को अपनी मर्जी से ना आजमाएं बल्कि इस बारे में उस चिकित्सा पैथी से संबंधित एक्सपर्ट या डॉक्टर की सलाह जरूर ले लें।

Updated on:
06 Jun 2026 03:43 pm
Published on:
07 Jun 2026 12:05 pm