
Ulnar Nerve Entrapment Hindi: रात को सोते समय अचानक हाथ में झनझनाहट होकर नींद खुल जाना या फोन पर बात करते-करते हाथ की छोटी उंगली का बिल्कुल सुन्न पड़ जाना, एक ऐसी परेशानी है जिसे बहुत से लोग कभी न कभी महसूस करते हैं। ज्यादातर लोग इसे सिर्फ खून का दौरा रुकना या गलत करवट सोना मानकर हाथ को झटकते हैं और भूल जाते हैं। लेकिन अगर आपकी कोहनी मोड़ने, टाइपिंग करने, गाड़ी चलाने या सोने के दौरान हाथ बार-बार सुन्न हो रहा है, तो यह कोई मामूली बात नहीं है। मेडिकल की दुनिया में इसे अल्नर नर्व एंट्रैपमेंट (Ulnar Nerve Entrapment) या क्यूबिटल टनल सिंड्रोम (Cubital Tunnel Syndrome) कहा जाता है। जॉन हॉपकिंस मेडिसिन और क्लीवलैंड क्लिनिक के अनुसार, यह समस्या तब पैदा होती है जब हाथ की मुख्य नसों में से एक पर लगातार दबाव पड़ता है। समय रहते इस पर ध्यान न दिया जाए, तो हाथों की पकड़ कमजोर हो सकती है। आइए जानते हैं इसके कारण और लक्षण क्या हैं?
क्लीवलैंड क्लिनिक के मुताबिक, हमारी गर्दन से निकलकर हाथ की उंगलियों तक कई नसें जाती हैं। इनमें से एक सबसे जरूरी नस है अल्नर नर्व। यह नस कंधे से होकर कोहनी के अंदरूनी हिस्से से गुजरती है और कलाई से होते हुए हमारी छोटी उंगली (Little Finger) और उसके पास वाली अनामिका (Ring Finger) तक पहुंचती है। कोहनी के पीछे जिस जगह से यह नस गुजरती है, वहां हड्डियों और मांसपेशियों के बीच एक बहुत संकरी जगह होती है, जिसे 'क्यूबिटल टनल' कहते हैं। यह वही जगह है जहां कभी कोहनी किसी चीज से टकरा जाए तो बिजली का तेज करंट सा लगता है, जिसे आम भाषा में 'फनी बोन' कहा जाता है। जब किसी वजह से इस संकरी सुरंग में नस पर लगातार दबाव पड़ता है, नस खिंचती है या सूज जाती है, तो नसों के सिग्नल रुकने लगते हैं और हाथ में सुन्नपन शुरू हो जाता है।
जॉन हॉपकिंस मेडिसिन के अनुसार, अल्नर नर्व पर दबाव बनने पर शरीर कुछ खास संकेत देने लगता है;
क्लीवलैंड क्लिनिक के मुताबिक, यह समस्या किसी बीमारी से ज्यादा हमारी रोजमर्रा की गलत आदतों और शारीरिक बनावट के कारण जन्म लेती है;
यदि आपको हफ्ते में कई बार यह लक्षण महसूस हो रहे हैं, तो किसी न्यूरोलॉजिस्ट या ऑर्थोपेडिक डॉक्टर से सलाह लें। डॉक्टर सबसे पहले हाथ और कोहनी का शारीरिक परीक्षण करते हैं, नस को हल्के से थपथपाकर देखते हैं कि करंट जैसा महसूस होता है या नहीं। इसके बाद बीमारी की पुष्टि और गंभीरता जानने के लिए नर्व कंडक्शन स्टडी (NCS) और इलेक्ट्रोमायोग्राफी (EMG) कराई जाती है। इन टेस्ट से यह साफ हो जाता है कि नस पर दबाव किस जगह है और नस को कितना नुकसान पहुंचा है।