प्यार की कोई भाषा, कोई सरहद नहीं होती। जब प्यार होता है तो ये सब चीजें पीछे छूट जाती हैं। कुछ ऐसा ही देखने को मिला जब जर्मन की एक युवती का दिल बिहार के लड़के पर आ गया। बस फिर क्या था। युवती ने प्यार को पाने के लिए सात समंदर की सीमा को पार किया और ले लिए सात जन्मों के फेरे।
जब प्यार किसी से होता है तो सीमाएं, सरहद, जात-पात, ऊंची नीच और भाषा इन सबको पीछे छोड़ देता है। कुछ ऐसा ही प्यार जर्मन की एक युवती को भी हुआ। जर्मन की ये युवती बिहार के एक युवक को अपना दिल दे बैठी। बस फिर क्या था, अपने प्यार को पाने के लिए इस लड़की ने सात समंदर की बाधा को भी पार कर लिया। इसके बाद जर्मनी की शोध छात्रा लारिसा बेंज ने अपने बिहारी प्रेमी सत्येंद्र कुमार के साथ हिंदू विधि विधान के साथ शादी रचाई। इस अनूठी शादी का साक्षी नालंदा का जिला राजगीर बना है। जब जर्मन की दुल्हनिया और बिहार का दूल्हा शादी के स्टेज पर चढ़े तो हर किसी की निगाह ठहर गई।
अपने प्यार के लिए विदेशी युवती ने हर बाधा को पार किया। उसने ना सिर्फ अपने प्यार के पाया और बल्कि सत्येंद्र के कल्चर को भी अपनाया। सत्येंद्र ने बताया कि वे कैंसर पर शोध करने के लिए स्वीडन गए थे। हम वहां स्किन कैंसर पर शोध कर रहे थे, जबकि लारिसा बेंज प्रोस्टेट कैंसर पर रिसर्च कर रही थी।
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तीन साल में परवान चढ़ा प्यार
दोनों की प्रेम कहानी तीन साल में परवान चढ़ी। जर्मन में शोध के लिए गए सत्येंद्र और लारिसा की यूनिवर्सिटी में मुलाकात हुई। दोनों के बीच दोस्ती हुई और देखते ही देखते ये दोस्ती प्यार में बदल गई।
स्पेशल वीजा से पहुंची भारत
सत्येंद्र के साथ सात जन्मों के फेरे लेने के लिए लारिसा जर्मने से स्पेशल वीजा पर भारत पहुंची। हालांकि इस दौरान लारिजा के माता-पिता को बीजा नहीं मिल पाया। इसके चलते उनके माता-पिता शादी में शामिल नहीं हो पाए। इस शादी के गवाह सत्येंद्र का परिवार और गांव वाले बने। नालंदा जिले के राजगीर स्थित एक होटल में शादी की सारी रस्में निभाई गईं।
भारत को लेकर क्या बोली लारिसा?
लारिसा ने बताया कि भारत के लोग बहुत अच्छे हैं। भारत की संस्कृति और जर्मनी के कल्चर में काफी अंतर है। लारिसा ने बताया कि, 'मैं अच्छे से हिंदी भाषा नहीं समझ सकती। बस कुछ ही शब्द समझ पाती हूं लेकिन मेरे पति मुझे ट्रांसलेट करके समझाने की कोशिश करते हैं।'
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