
Indore High Court decision: मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में हाइकोर्ट की खंडपीठ ने एक अहम फैसला सुनाया। धार्मिक पहचान छिपाकर विवाह करने और उसके बाद धर्म परिवर्तन की हिंसा के मामले में फैसला आ गया है। कोर्ट ने पीड़िता उसकी नाबालिग पुत्री को 20 हजार रुपए प्रतिमाह भरण पोषण देने का आदेश दिया है। अपने आदेश में जस्टिस गजेंद्र सिंह की कोर्ट ने कहा, यदि किसी महिला से धार्मिक पहचान छिपाकर विवाह किया गया हो और उससे संतान भी उत्पन्न हुई हो तो केवल विवाह की वैधता के आधार पर उसे भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता।
अभिभाषक राजेश जोशी ने बताया, 23 फरवरी 2020 को कोरोना के दौरान एक मंदिर में अन्य धर्म के व्यक्ति ने स्वयं को हिंदू बताकर महिला से विवाह किया था। बाद में गर्भावस्था के दौरान महिला को आधार कार्ड से उसकी वास्तविक पहचान का पता चला। इसके बाद पति ने उस पर महिला धर्म अपनाने के लिए दबाव बनाया।
महिला द्वारा बोहरा धर्म स्वीकार करने से इनकार करने पर उसके साथ मारपीट की गई। महिला की ओर से दायर याचिका में रंगपंचमी के दिन आरोपी द्वारा दो माह की बच्ची को छीनकर नुकसान पहुंचाने का प्रयास करने का भी आरोप लगाया गया, जिसकी द्वारकापुरी थाने में एफआइआर भी दर्ज की गई थी। बाद में पति द्वारा धमकियां देने के मामले में दो और एफआइआर भी दर्ज हुई है।
महिला ने इससे पहले परिवार न्यायालय में केस दायर किया था। परिवार न्यायालय ने 2023 में महिला को कानूनी रूप से विवाहित नहीं मानते हुए उसका भरण-पोषण दावा खारिज कर दिया था, जबकि पुत्री के लिए मात्र दो हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण स्वीकृत किया था।
परिवार न्यायालय के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में महिला ने याचिका दायर की थी। सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में टिप्पणी की कि धार्मिक पहचान छिपाकर विवाह करने और उससे संतान उत्पन्न होने की स्थिति में महिला को केवल तकनीकी आधार पर भरण-पोषण से वंचित करना न्यायसंगत नहीं है। इसी आधार पर न्यायालय ने निचली अदालत का आदेश रद्द कर पत्नी और पुत्री दोनों के लिए 10-10 हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण मंजूर किया।
वहीं बीते दिनों हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने एक नाबालिग बालिका की अभिरक्षा (कस्टडी) से जुड़े मामले में आदेश देते हुए उसकी अस्थायी कस्टडी मां को सौंप दी है। साथ ही शर्त भी रखी है कि सक्षम न्यायालय की अनुमति के बिना बालिका को राजस्थान की सीमा से बाहर नहीं ले जा सकेंगे। जस्टिस प्रणय वर्मा और जस्टिस जय कुमार पिल्लई की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की। मां, उसके साथ रहने वाला व्यक्ति, बालिका और पिता सभी उपस्थित हुए।
कोर्ट ने बंद कमरे में आवश्यक पक्षों के बीच चर्चा करते हुए बालिका की इच्छा भी जानी। मामला मूसाखेड़ी क्षेत्र निवासी एक व्यक्ति द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने कहा था कि उसकी पत्नी और 11 वर्षीय बेटी 4 मई से लापता हैं। उसने दोनों के राजस्थान में होने की आशंका जताते हुए पुलिस आयुक्त को शिकायत की थी। इसके बाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई।