सीआईडी ने कमिश्नर को सौंपा जिम्मा...कहा- बताएं ये कौन
जयपुर . रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों की समस्या खत्म नहीं हुई ऊपर से राजस्थान में घुसपैठिए बांग्लादेशियों ने स्थानीय प्रशासन से मिलीभगत कर स्थानीय पहचान पत्र कब्जा लिए हैं। इससे अब राजस्थान पुलिस की सीआईडी पसोपेश में है कि ये घुसपैठिए भारतीय हैं या बांग्लादेशी। सीआईडी ऐसे घुसपैठियों की तस्दीक भी कर चुकी है, जो अवैध तरीके से सीमा पार कर भारत में आए और यहां ही बस गए। पुलिस का सिरसर्द तब बढ़ गया, जब ऐसे ही घुसपैठिए यहां डकैती, लूट और हत्या जैसे जघन्य अपराधों को भी अंजाम दे रहे हैं।
सीआईडी ने जयपुर में ही 60 से अधिक संदिग्ध बांग्लादेशियों की लिस्ट बनाई है, जिन्होंने यहां का वोटर कार्ड, राशन कार्ड और अन्य दस्तावेज बना लिए हैं। पुशबैक की कार्रवाई के लिए सीआईडी इन तक पहुंची तो इन्होंने स्थानीय दस्तावेज दिखाए, जिन्हें देख सीआईडी भी चौंक गई। अब सीआईडी ने जयपुर पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल को इन संदिग्ध बांग्लादेशियों की लिस्ट और दस्तावेज उपलब्ध करवाएं हैं।
हर दस्तावेज जांचा जाए
पुलिस मुख्यालय की सीआईडी ने कमिश्नरेट पुलिस को कहा है कि संदिग्ध बांग्लादेशियों के दस्तावेजों की जांच की जाए। दस्तावेज कैसे बनाए, इनके दस्तावेज बनाने में किन कर्मचारी और अधिकारियों की भूमिका है। दस्तावेज किस वर्ष बने और किस आधार पर बने। पुलिस सूत्रों के अनुसार दो माह से कमिश्नरेट पुलिस ने प्रशासन ने इन दस्तावेजों के बनने की जानकारी मांग रखी है, लेकिन नहीं मिली।
इधर लग रहा दुष्कर्म का आरोप
जयपुर में 300 के करीब रोहिंग्या मुस्लिम लोगों की पहचान की गई, जो यहां पर अवैध तरीके से रह रहे हैं। सीआईडी सूत्रों के मुताबिक, जयपुर कमिश्नरेट के सोडाला थाना अंतर्गत एक रोहिंग्या मुस्लिम युवक द्वारा एक बालिका से ज्यादती करने का मामला सामने आया है।
...फिर अन्य जिले
सीआईडी ने अभी जयपुर जिले में संदिग्ध बांग्लादेशियों की पहचान की है। इसके बाद राजस्थान के अन्य जिलों में इनकी पहचान की जाएगी, जिन्होंने स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत से यहां का वोटर कार्ड, राशन कार्ड और अन्य दस्तावेज बना लिए हैं। राजस्थान में जयपुर, अजमेर , अलवर और भरतपुर में बांग्लादेशी अधिक हैं। अन्य जिलों में इनकी संख्या अभी ना के बराबर है।
पश्चिम बंगाल से भी पहचान पत्र
सीआईडी सूत्रों ने बताया कि बांग्लादेश से अवैध तरीके से सीमा पर कर आने वाले लोग पश्चिम बंगाल में स्थानीय प्रशासन से मिलीभगत कर स्थानीय पहचान पत्र बना लेते हैं। इससे भारतीय व बांग्लादेशी में अंतर करना मुश्किल हो जाता है और ये स्थानीय लोगों में घुलमिल जाते हैं।