
जयपुर। पंचायत और नगरीय निकाय चुनाव से पहले मतदाता सूची अब राजनीतिक दलों के लिए रणनीति का अहम आधार बन गई है। पंचायत-निकाय चुनाव से पहले कांग्रेस मतदाता सूचियों की बूथवार मैपिंग कर एसआइआर के बाद बदले समीकरण और संभावित वोट बैंक का आकलन कर कर रही है। वहीं, नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा ने स्थानीय गुटबाजी और विवाद से बचने के लिए दूसरे क्षेत्रों के कार्यकर्ताओं को वार्ड प्रभारी बनाने की रणनीति बनाई है।
राजस्थान कांग्रेस ने बूथ स्तर पर मतदाता सूची की मैपिंग शुरू कराई है। पार्टी पंचायत-निकाय चुनाव के लिए तैयार सूची का एसआइआर के बाद 2026 में जारी नई मतदाता सूची से तुलनात्मक अध्ययन करा रही है। कांग्रेस का फोकस खास तौर पर एसआइआर में हटाए गए 40 लाख से अधिक नामों पर है। पार्टी यह पता लगाने में जुटी है कि हटे नामों में कितने मतदाता पंचायत-निकाय चुनाव की सूची में अब भी मौजूद है और इसका कांग्रेस-भाजपा के संभावित वोट बैंक पर क्या असर पड़ सकता है।
बूथवार रिपोर्ट के आधार पर कांग्रेस ऐसे क्षेत्रों को चिन्हित करेगी, जहां मतदाता सूची में बड़ा बदलाव हुआ है। इसके जरिए पार्टी न केवल अपनी चुनावी रणनीति और बूथ प्रबंधन को मजबूत करने की तैयारी कर रही है, बल्कि मतदाता सूची को लेकर उठने वाले सवालों को भी राजनीतिक मुद्दा बनाने की संभावना तलाश रही है।
कांग्रेस का कहना है कि पंचायत-निकाय चुनाव के लिए राज्य निर्वाचन आयोग ने भारत निर्वाचन आयोग की 2025 की मतदाता सूची के आधार पर नई सूची तैयार कराई है। वहीं एसआइआर के बाद 2026 में मतदाता सूची में बड़ा बदलाव हुआ है। ऐसे में कांग्रेस दोनों सूचियों का बूथवार मिलान कर रही है। पार्टी का मानना है कि बूथवार आंकड़े सामने आने के बाद कई क्षेत्रों के चुनावी समीकरण को नए सिरे से समझा जा सकेगा।
निकाय चुनाव को लेकर भाजपा ने रणनीति को धार देना शुरू कर दिया है। पार्टी की ओर से वार्डवार नियुक्त किए जाने वाले प्रभारी उसी वार्ड के बजाय दूसरे क्षेत्र से होंगे। संगठन ने यह व्यवस्था आरोप-प्रत्यारोप, गुटबाजी और टिकट की दावेदारी को लेकर पैदा होने वाले विवाद से बचने के लिए तैयार की है। पार्टी का मानना है कि दूसरे क्षेत्र का प्रभारी होने से वह स्थानीय खेमेबाजी से अपेक्षाकृत दूर रहेगा और चुनावी प्रबंधन पर निष्पक्ष तरीके से फोकस कर सकेगा। हालांकि, संगठन के इस फैसले के साथ ही एक सवाल भी खड़ा हो रहा है। जिस वार्ड में लंबे समय से कार्यकर्ता सक्रिय है, वहां चुनाव के दौरान उनकी भूमिका क्या होगी? ऐसे में बाहरी वार्ड प्रभारी और स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच बेहतर तालमेल बनाने की चुनौती भी रहेगी।
भाजपा की रणनीति में वार्ड प्रभारी को चुनावी गतिविधियों के संचालन और निगरानी की जिम्मेदारी देने की तैयारी है, जबकि स्थानीय कार्यकर्ताओं की भूमिका मतदाताओं से संपर्क, बूथ प्रबंधन और क्षेत्र की स्थानीय समस्याओं की जानकारी जुटाने में अहम रहेगी। यानी, चुनावी नेटवर्क स्थानीय कार्यकर्ताओं के भरोसे चलेगा।
भाजपा की रणनीति सिर्फ चुनाव के समय प्रचार तक सीमित रखने के बजाय वार्ड स्तर पर पहले से जुटाए गए फीडबैक को धरातल पर उतारने की भी है। किस वार्ड में पार्टी की स्थिति मजबूत है, कहां स्थानीय स्तर पर विरोध है, किन कार्यकर्ताओं का प्रभाव है और किन मुद्दों पर विपक्ष भाजपा को घेर सकता है, इन सभी पहलुओं को चुनावी तैयारी में शामिल किया जा रहा है।