
Rajasthan Women Farmers : राजस्थान के खेतों में काम करने वाले हर 10 में से 8 महिलाएं पसीना बहा रही है, लेकिन जब खेत की मालकिन बनने की बात आती है तो तस्वीर बदल जाती है। खेती की रीढ़ मानी जाने वाली महिलाओं के नाम पर राज्य में सिर्फ 10.12 फीसदी कृषि भूमि दर्ज है। जिन हाथों से अन्न उगता है, उन्हीं हाथों के पास जमीन का मालिकाना हक नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर भी हालात अलग नहीं हैं। देश के कृषि कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी 59.81 फीसदी है लेकिन कृषि भूमि के परिचालन स्वामित्व के मामले में महज 13.96 फीसदी जमीन ही महिलाओं के नाम दर्ज हैं। खेतों में महिलाओं की भागीदारी जितनी बड़ी है, जमीन के कागजों पर उनका अधिकार उतना ही सीमित है।
राजस्थान में बीज बोने से लेकर निराई, कटाई और पशुपालन तक ग्रामीण कृषि व्यवस्था का बड़ा हिस्सा महिलाएं संभाल रही है। राष्ट्रीय सांख्यिकी की श्रम बल सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान में कृषि कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी 78.12 प्रतिशत है, जो देश में सबसे ज्यादा है। लेकिन जब जमीन पर अधिकार की बात आती है तो तस्वीर चौंकाने वाली है। जमीन के मालिकाना हक में हम राष्ट्रीय औसत से भी पीछे है।
कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी के मामले में हिमाचल प्रदेश में 77.34 फीसदी, झारखंड में 75.57 फीसदी, जम्मू-कश्मीर में 74.73 फीसदी, बिहार में 74.58 फीसदी और मध्य प्रदेश में 72.62 फीसदी महिला भागीदारी दर्ज है। वहीं, कृषि भूमि के परिचालन स्वामित्व में महिलाओं की हिस्सेदारी के मामले में लक्षद्वीप 41.03 फीसदी, मेघालय 34.32 फीसदी, आंध्र प्रदेश 30.09 फीसदी और अंडमान व निकोबार 29.80 फीसदी के साथ आगे हैं। इसके विपरीत पंजाब में महिलाओं के नाम जमीन की हिस्सेदारी 1.55 फीसदी, असम में 1.67 फीसदी, पश्चिम बंगाल में 3.17 फीसदी और ओडिशा में 4.06 फीसदी है।
भूमि स्वामित्व न होने के कारण महिला किसानों को संस्थागत ऋण, बीमा, सब्सिडी और मुआवजे जैसी सुविधाओं में दिक्कत आती रही है। इसलिए ग्रामीण विकास मंत्रालय के भूमि संसाधन विभाग ने सभी राज्यों से भू-अभिलेखों में लैंगिक मद जोड़ने का अनुरोध किया है। इसका उद्देश्य बिना भूमि स्वामित्व वाली महिला कृषकों और पट्टे पर खेती करने वाली महिलाओं को भी औपचारिक किसान के रूप में पहचान दिलाना है।