जयपुर

‘स्त्री : माया का अवतार’ पर आई कई प्रतिक्रियाएं, किसी ने कहा, भाव को समझने की जरूरत तो कोई बोला- लेख जीवन का मार्गदर्शन

पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी के 'स्त्री : माया का अवतार' विषय पर दिए विचार को लेकर तमाम प्रतिक्रिया आई। किसी ने कहा कि लेख स्त्री की भूमिका को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बहुत ऊंचे स्थान पर प्रस्तुत करता है। तो किसी ने कहा आज के लेख में स्त्री की भूमिका को विस्तृत रूप में प्रस्तुत किया गया है। लेख अनुपम ज्ञान का स्रोत है। जानिए 'स्त्री : माया का अवतार' क्या क्या प्रतिक्रियाएं आईं।

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पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी। फोटो पत्रिका

पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी के 'स्त्री : माया का अवतार' विषय पर दिए विचार को लेकर तमाम प्रतिक्रिया आई। किसी ने कहा कि लेख स्त्री की भूमिका को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बहुत ऊंचे स्थान पर प्रस्तुत करता है। तो किसी ने कहा आज के लेख में स्त्री की भूमिका को विस्तृत रूप में प्रस्तुत किया गया है। लेख अनुपम ज्ञान का स्रोत है। जानिए 'स्त्री : माया का अवतार' क्या क्या प्रतिक्रियाएं आईं।

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मंगलकामना का कराती है अहसास

हर पर्व, हर शुभ कार्य में वह दिव्यता और मंगलकामना का अहसास कराती है। मातृत्व, समर्पण और संवेदना उसकी विशिष्ट पहचान हैं। वास्तव में स्त्री जीवन की आधारशिला है-माया भी, शक्ति भी और सृष्टि की अनंत प्रेरणा भी।
राजेन्द्र सिंह ठाकुर, विचारक, कटनी

आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से ऊंचे स्थान पर पेश करता है लेख

लेख स्त्री की भूमिका को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बहुत ऊंचे स्थान पर प्रस्तुत करता है। इसमें मातृत्व, संवेदनशीलता और परिवार के प्रति समर्पण जैसे गुणों को सुंदर ढंग से उभारा गया है। आज की स्त्री केवल माया या त्याग का प्रतीक नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर और निर्णयक्षम भी है। कुल मिलाकर, लेख विचारोत्तेजक है।
हेमराज सेन, प्रोफेसर इतिहास, कटनी

स्त्री को सृष्टि की मूल शक्ति और माया के रूप में करता है पेश

आज का लेख भारतीय दार्शनिक परंपरा के आधार पर स्त्री को सृष्टि की मूल शक्ति और माया के रूप में प्रस्तुत करता है। लेख में ममता, त्याग और सृजनशीलता जैसे गुणों के माध्यम से स्त्री के आध्यात्मिक महत्व को प्रभावी ढंग से उभारा गया है। वैचारिक रूप से लेख गहराई लिए हुए है। यह एक चिंतनशील और प्रभावशाली लेख है, जो स्त्री के आध्यात्मिक स्वरूप को रेखांकित करता है।
प्रो. कृष्णा नागर, रसायन शास्त्र, प्राचार्य, आदर्श महाविद्यालय, राजगढ़

स्त्री के कई रूप व भूमिकाएं

स्त्री के कई रूप व भूमिका होते हैं। मातृत्व रूप स्पष्ट रूप में देखने को मिलता है, लेकिन कई भूमिका ऐसी होती हैं, जिन्हें केवल महसूस किया जा सकता है। आज के लेख में स्त्री की भूमिका को विस्तृत रूप में प्रस्तुत किया गया है। लेख अनुपम ज्ञान का स्रोत है।
राजकुमार अग्रवाल, सचिव बेतवा उत्थान समिति, विदिशा

भाव को समझने की जरूरत

सांसारिक जीवन में स्त्री की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है, जो अपने विवेक और ज्ञान से समाज को आगे बढ़ाती है। घर के कामकाज को संभालने के साथ ही संतान और परिवार की जिम्मेदारी को अच्छे से निभाती है। आधुनिकता के इस दौर में हमारी सोच बदली। परिवार में सामूहिक रूप से रहना किसी को पसंद नहीं। पत्नी व संतान के अलावा कोई दूसरा साथ नहीं होना चाहिए। यह हमारे नैतिक चरित्र के पतन का मुख्य कारण है। स्त्री चाहे तो घर को स्वर्ग बना सकती है, नहीं तो नरक में धकेल सकती है। इसी भाव को समझने की जरूरत है।
अनिता परिहार, सामाजिक कार्यकर्ता, धार

लेख जीवन का मार्गदर्शन

लेख जीवन का मार्गदर्शन है। यह स्त्री के सूक्ष्म और कारण शरीर की गहराई से चर्चा करता है। इसमेंसही कहा गया है कि स्त्री केवल स्थूल शरीर तक सीमित नहीं है, बल्कि ब्रह्म के विवर्त में उसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। मातृत्व को केवल शारीरिक कर्म नहीं, बल्कि आत्मिक और कारण स्तर का यज्ञ बताया गया है। विवाह के बाद स्त्री सहजता से सूक्ष्म और कारण शरीर से जुड़ जाती है, जबकि पुरुष अक्सर स्थूल स्तर पर ही रह जाता है। लेख यह भी स्पष्ट करता है कि हर युग में जीवन संचालन स्त्री के हाथ में रहा है।
वीरेन्द्र सिंह ठाकुर, साहित्यकार, बुरहानपुर

परिवार और समाज की नींव में स्त्री की अहम भूमिका

स्त्री केवल एक इंसान नहीं, बल्कि ममता, त्याग और सृजन की प्रतीक है। आज के समय में जहां लोग भागदौड़ में उलझे हैं, वहां यह लेख हमें स्त्री के असली स्वरूप और उसकी भूमिका पर सोचने के लिए प्रेरित करता है। परिवार और समाज की नींव में स्त्री की अहम भूमिका होती है, जिसे हमें समझना और सम्मान देना चाहिए।
पंडित विशाल मिश्रा, बैतूल

स्त्री केवल भौतिक अस्तित्व नहीं

आलेख में स्त्री को सृजन, ममता और संवेदनशीलता की प्रतीक बताया गया है, जो परिवार और समाज के संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसमें माया, आत्मा और शरीर जैसे दार्शनिक तत्वों के माध्यम से यह समझाने का प्रयास किया गया है कि स्त्री केवल भौतिक अस्तित्व नहीं, बल्कि एक गहरी आध्यात्मिक शक्ति भी है। आज के समय में स्त्री केवल पालन-पोषण तक सीमित नहीं, बल्कि शिक्षा, विज्ञान, राजनीति और अन्य क्षेत्रों में भी अग्रणी है। इसलिए, स्त्री को व्यापक और समकालीन दृष्टिकोण से समझना अधिक उचित होगा।
डॉ उमेश रावत, चिकित्सक, शिवपुरी

ब्रह्मा और माया एक ही पहलू के दो आवरण

ब्रह्मा एक सर्वव्यापी तत्व है। इसका मूल भाव समझना अत्यंत कठिन। ब्रह्मा और माया एक ही पहलू के दो आवरण हैं। अमूमन मनुष्य माया के वशीभूत होकर बाहरी तत्वों से इतना प्रभाावित हो जाता है कि वह ब्रह्म के मूल स्वरूप को समझ नहीं पाता। स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर की जो व्याख्या गुलाब कोठारी ने की है, वह प्रासंगिक है।
प्रदीप अवस्थी, वरिष्ठ साहित्यकार, मुरैना

माया का ही स्वरूप है स्त्री

प्रत्येक युग में जीवन का संचालन स्त्री के हाथ में है। स्त्री माया का ही स्वरूप है, जो संसार में विवर्त की भूमिका निभाती है। आज के लेख में कोठारी ने माया और स्त्री की अवधारणा सटीक शब्दों में कई है। लेख में समझाया गया है कि सब कुछ ब्रह्म से ही उत्पन्न है और माया के प्रभाव से चलता है। स्त्री जन्म से ही माया का अवतार होती है ।
रामानंद शर्मा, प्रोफेसर, भिण्ड

मानव शरीर के तीन स्वरूप का किया जिक्र

लेख में गुलाब कोठारी ने मानव शरीर के तीन स्वरूप स्थूल,सूक्ष्म और कारण शरीर का जिक्र किया है। साथ ही इसकी व्याख्या की है। इसके साथ ही स्त्री पुरुष संबंधों के बारे में भी लिखा गया है। उन्होंने सही कहा है कि स्त्री मातृत्व भाव लेकर जन्म लेती है। यह कहना वाकई सुखद है।
अनिल भार्गव, छिंदवाड़ा

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Updated on:
21 Mar 2026 10:54 pm
Published on:
21 Mar 2026 10:51 pm
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