विश्व प्रसिद्ध सोनार दुर्ग पर प्रदूषण और प्रशासनिक अनदेखी का काला साया मंडरा रहा है। शहर में बिना फिटनेस जांच के दौड़ रहे तिपहिया वाहन और टैक्सियां लगातार जहरीला धुआं उगल रहे हैं, जिससे किले के पीले पत्थरों की नैसर्गिक चमक काली पड़ रही है।
जैसलमेर: करीब 870 साल पुराने सोनार दुर्ग की सुनहरी आभा अब वाहनों के धुएं की कालिमा से प्रभावित होती नजर आ रही है। विश्वभर में प्रसिद्ध इस धरोहर को देखने हर साल बड़ी संख्या में देश-विदेश से पर्यटक पहुंचते हैं। लेकिन दुर्ग तक जाने वाले घाटीदार मार्ग की प्राचीरों पर जमी कालिख इसकी सुंदरता को मद्धम कर रही है।
दुर्ग के चारों प्रोलों से होकर गुजरने वाले रास्तों पर दिनभर तिपहिया टैक्सियों की आवाजाही बनी रहती है। इनमें से बड़ी संख्या में पुराने वाहन हैं, जिनसे अत्यधिक धुआं निकलता है। लंबे समय से इन वाहनों की फिटनेस जांच नहीं होने से समस्या लगातार बढ़ रही है।
पर्यटन सीजन के दौरान कुछ समय के लिए प्रतिबंध लगाया गया था, लेकिन ऑफ सीजन में फिर से इनकी आवाजाही शुरू हो जाती है। प्रदूषण फैलाने में सबसे बड़ी भूमिका तिपहिया टैक्सियों की सामने आ रही है। ये वाहन सुबह से देर रात तक सवारियों को लेकर दुर्ग की चढ़ाई और उतराई करते हैं।
अधिक कमाई के लिए कई बार आठ से 10 यात्रियों को बैठा लिया जाता है, जिससे इंजन पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और धुआं अधिक निकलता है। यह धुआं सीधे दुर्ग की दीवारों से टकराता है।
दुर्ग की दीवारों पर इसका प्रभाव साफ दिखाई देने लगा है। विशेष रूप से जमीन से तीन से चार फीट ऊंचाई तक दीवारें काली पड़ती जा रही है। यह वही हिस्सा है, जहां वाहनों के साइलेंसर से निकलने वाला धुआं सीधे असर करता है।
पर्यटकों ने भी इस स्थिति पर चिंता जताई है। पंजाब से आए पर्यटक हरमिंदर सिंह और गुरतेज कौर ने बताया कि पूरे मार्ग में दीवारों पर कालिमा नजर आती है, जिससे ऐतिहासिक धरोहर की प्राकृतिक सुंदरता प्रभावित हो रही है।
इसके अलावा बड़ी संख्या में दोपहिया वाहनों की आवाजाही भी प्रदूषण को बढ़ा रही है। उनके अनुसार यदि समय रहते प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया तो धुएं का यह असर आने वाले समय में दुर्ग की पहचान पर गहरा प्रभाव डाल सकता है।
उनका मानना है कि वाहनों की नियमित फिटनेस जांच, सीमित प्रवेश और वैकल्पिक परिवहन व्यवस्था से इस समस्या पर नियंत्रण पाया जा सकता है।