
मंडोर . घाटू के पत्थर से निर्मित मंडोर की छतरियों और देवल के इतिहास की कहानी भी अनूठी है। मंडोर के प्राचीन देवल तत्कालीन राजा महाराजाओं की स्मृति को चिरस्थाई बनाए रखने के लिए निर्मित किए गए हैं लेकिन मंदिरों की समृद्ध स्थापत्य निर्माण कला शिल्पकला का बेजोड़ उदाहरण है। मारवाड़ में राजा महाराजाओं के स्वर्गवास पर उनके अंत्येष्टि स्थल पर ही भव्य स्मारक के निर्माण की परंपरा रही है। मंडोर में सबसे पुराना देवल राव मालदेव का बना हुआ है । इस देवल के गर्भ ग्रह पर बना शिखर गुंबद विशेष आकर्षण का केंद्र है। मंडोर उद्यान में मारवाड़ के प्रतापी राजा राव मालदेव का देवल का निर्माण उसके पांचवे पुत्र मोटाराजा उदयसिंह ने विक्रम संवत 1647 में करवाया था। विक्रम संवत 1850 में सबसे बाद में बने महाराजा अजीत सिंह का देवल सबसे बड़ा और भव्य है जबकि उनसे पहले बने देवल क्रमानुसार कमतर आकार और भव्यता लिए है। अंत्येष्टी स्थल पर निर्मित स्मारकों को आमतौर पर छतरी कहा जाता है लेकिन मारवाड़ में दिवंगत आत्मा को पितृ अथवा देवता मानते हुए उनके स्मारकों को देवल और थड़ा आदि नाम भी दिए जाने की परम्परा रही हैं। जब मंडोर मारवाड़ की राजधानी था तब और जोधपुर राजधानी बनने के बाद तक राजा महाराजाओं का अंतिम संस्कार मंडोर दुर्ग के पीछे डेढ किलोमीटर की दूरी पर स्थित पचकुंडा में किया जाता था। पचकुण्डा में जहां राव चुंडा, राव रणमल, राव जोधा, राव गंगा के स्मारक बने हुए हैं। पचकुण्डा में जहां राव चुंडा, राव रणमल, राव जोधा, राव गंगा के स्मारक बने हुए हैं। मंडोर के बाद मारवाड़ की नई राजधानी जोधपुर होने के बाद अंतिम संस्कार वर्तमान मंडोर उद्यान में किए जाने लगे थे। मंडोर में राव मालदेव, मोटा राजा उदयसिंह, सवाई राजा सूर सिंह, महाराजा गज सिंह प्रथम, महाराजा जसवंत सिंह और महाराजा अजीतसिंह के देवल देशी विदेशी सैलानियों के लिए आकर्षण का केन्द्र है।