Jodhpur News: जोधपुर एम्स में आइसीयू मरीजों की रिकवरी तेज करने के लिए उन्हें समय-समय पर प्राकृतिक रोशनी और खुले माहौल में लाने की नई पहल शुरू की गई है। डॉक्टरों का कहना है कि इससे मरीजों का तनाव कम हो रहा है और मानसिक व शारीरिक सुधार तेजी से देखा जा रहा है।
जोधपुर। अखिल भारतीय आयुर्वेद विज्ञान संस्थान (एम्स) जोधपुर में आइसीयू में भर्ती गंभीर मरीजों के इलाज को लेकर एक नई पहल की गई है। बीमारी से परेशान मरीजों के लिए यह पहल वरदान साबित हो रही है। यहां मरीजों को सिर्फ मशीनों और बंद कमरों तक सीमित रखने के बजाय उन्हें समय-समय पर आइसीयू से बाहर निकालकर सूरज की रोशनी से भरे गलियारे में लाया जा रहा है, जिससे उनकी रिकवरी में उल्लेखनीय सुधार देखा जा रहा है।
लंबे समय तक आइसीयू के बंद वातावरण में रहने, लगातार कृत्रिम रोशनी और मशीनों की आवाज के कारण मरीजों की 'स्लीप-वेकअप साइकिल' बिगड़ जाती है। इससे 'हाइपोएक्टिव डेलीरियम' की स्थिति बनती है, जो मरीज को मानसिक रूप से कमजोर कर देती है। ऐसे में प्राकृतिक रोशनी, परिजनों का साथ और सामान्य माहौल मरीज के मानसिक स्वास्थ्य को सुधारने में अहम भूमिका निभाता है।
आईसीयू लचीला विजिटिंग सिस्टम है। साथ ही संक्रमण नियंत्रण का ध्यान रखा जाता है। आईडी कार्ड और सभी सुरक्षा मानकों को पूरा करने के बाद ही प्रवेश मिलता है। यह भी मरीज को जल्द ठीक करने में मददगार साबित होता है। चिकित्सा कर्मियों और विजिटर्स को सुरक्षा मानकों का ध्यान रखना अनिवार्य है।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने स्वास्थ्य सेवाओं, विशेषकर क्रिटिकल केयर की स्थिति में सुधार के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कहा है कि वे तीन हफ्ते के भीतर आइसीयू के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए व्यावहारिक और ठोस कार्ययोजना तैयार करें। साथ ही स्पष्ट किया कि देश के सभी अस्पतालों में आइसीयू के मानक एक समान और पारदर्शी होने चाहिए, ताकि किसी भी मरीज को बुनियादी सुविधाओं या स्टाफ की कमी के कारण असुरक्षित महसूस न करना पड़े।
एम्स में 30 बेड का आइसीयू है। यहां मरीज औसतन 8 से 10 दिन भर्ती रहते हैं और स्थिति के अनुसार उन्हें गलियारे में लाया जाता है। गलियारे की बड़ी खिडकियों पर ग्लास लगे हुए हैं, ऐसे में संक्रमण का खतरा नहीं रहता। सूर्य की रोशनी में रखने से मरीजों के शरीर में कॉर्टिसोल हार्मोन का स्तर नियंत्रित होता है और ऑक्सीटोसिन हार्मोन में वृद्धि होती है।
इससे तनाव कम होता है और मरीज तेजी से ठीक होने लगता है। इन ग़लियारों में मरीज परिजनों से आमने-सामने बात करते हैं और खाना भी खा सकते हैं। ऑक्सीजन सपोर्ट पर चल रहे मरीजों को भी पोर्टेबल सिलेंडर के जरिए बाहर लाया जाता है। आइसीयू में भर्ती होने का मानसिक दबाव इस प्राकृतिक वातावरण में कम होता है और वे बेहतर महसूस करते हैं। उनका आत्मविश्वास लौटता है। कोविड के बाद इस व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित और नियमित किया गया।.
एम्स में अन्य अस्पतालों की तरह सख्त विजिङ्क्षटग टाइम नहीं है। परिजन कभी भी मरीज से मिल सकते हैं। परिजनों के सम्पर्क में रहने से उनकी रिकवरी तेज होती है। हमने आइसीयू में अपारदर्शी ग्लास पार्टिशन कर रखा है, जिससे प्राइवेसी भी बनी रहती है।
प्राकृतिक वातावरण की भूमिका
गलियारे में मरीज को परिजनों के साथ अकेला नहीं छोड़ा जाता है। उसके साथ नर्सिंग स्टाफ मौजूद रहता है। गंभीर इलाज में तकनीक के साथ मानवीय संवेदना और प्राकृतिक वातावरण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।