
यशवंत झारिया/Bhoramdeo Temple: छत्तीसगढ़ के 'खजुराहो' के नाम से प्रसिद्ध ऐतिहासिक भोरमदेव मंदिर में करीब 936 साल बाद एक ऐसा दुर्लभ वैदिक अनुष्ठान होने जा रहा है, जिसे मंदिर की आध्यात्मिक ऊर्जा के पुनर्जागरण से जोड़ा जा रहा है। 25 से 29 जुलाई तक आयोजित होने वाले महाचतुर शुद्धि सहस्र कलशम् अनुष्ठान में केरल से आने वाले वैदिक आचार्य और तांत्रिक विद्वान शास्त्रोक्त विधि से 30 से अधिक धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराएंगे। आयोजन को लेकर मंदिर परिसर और जिला प्रशासन ने तैयारियां तेज कर दी हैं।
आगम शास्त्रों के अनुसार लंबे समय के बाद मंदिरों में विशेष अनुष्ठान कर उनकी सुप्त देवशक्ति का पुनर्जागरण किया जाता है। इसी परंपरा के तहत भोरमदेव मंदिर में यह आयोजन किया जा रहा है। अनुष्ठान का उद्देश्य मंदिर के ऊर्जा केंद्रों को पुन: सक्रिय करना, क्षेत्रपाल देवताओं का सम्मान पुनस्र्थापित करना, भूमि की पवित्रता लौटाना और हाटकेश्वर महादेव शिवलिंग की दिव्य शक्ति का पुन: आह्वान करना बताया गया है।
पांच दिवसीय आयोजन में केरल से 15 से 20 वैदिक आचार्य शामिल होंगे। उनके निर्देशन में गणपति होम, महामृत्युंजय होम, रुद्राभिषेक, सहस्र कलशाभिषेक, श्रीचक्र पूजा, वास्तु होम, सुदर्शन होम, पंचगव्य, क्षीराभिषेक सहित 30 से अधिक वैदिक अनुष्ठान संपन्न होंगे। भोरमदेव मंदिर के पुजारी पंडित आशीष शर्मा के अनुसार, पुराणों और आगम शास्त्रों में ऐसे अनुष्ठानों को मंदिर की दिव्य ऊर्जा को पुन: सक्रिय करने का माध्यम माना गया है, जिससे मंदिर जनकल्याण का केंद्र बना रहे।
आयोजन में शामिल होने वाले केरल के आचार्यों, विशिष्ट अतिथियों और श्रद्धालुओं के ठहरने, सुरक्षा और अन्य व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी जिला प्रशासन को सौंपी गई है। आयोजन समिति के साथ मिलकर प्रशासन सभी व्यवस्थाओं को अंतिम रूप देने में जुटा है।
बता दें कि कबीरधाम (कवर्धा) जिले में स्थित भोरमदेव मंदिर छत्तीसगढ़ की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहरों में से एक है। नागर शैली की स्थापत्य कला और आकर्षक शिल्पकला के कारण इसे अक्सर 'छत्तीसगढ़ का खजुराहो' कहा जाता है। भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी के आसपास फणी नागवंशी शासक राजा रामचंद्र देव द्वारा कराया गया माना जाता है।