
Kondagaon News: छत्तीसगढ़ के पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान और औषधीय वनस्पतियों के संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए कोण्डागांव में पारंपरिक वैद्य स्वैच्छिक प्रमाणन कार्यक्रम आयोजित किया गया। ऑडिटोरियम में आयोजित इस कार्यक्रम में प्रदेश के 309 पारंपरिक वैद्यों को प्रमाण पत्र देकर उनके अनुभव, पारंपरिक ज्ञान और सेवाभाव का सम्मान किया गया। कार्यक्रम में वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप ने पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के ज्ञान को दस्तावेजीकरण के जरिए सुरक्षित रखने और इसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाने पर जोर दिया।
छत्तीसगढ़ आदिवासी स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड की ओर से आयोजित कार्यक्रम में केदार कश्यप मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। बोर्ड के अध्यक्ष विकास मरकाम ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। वहीं, बस्तर विकास प्राधिकरण की उपाध्यक्ष एवं कोंडागांव विधायक लता उसेंडी और बोर्ड के उपाध्यक्ष अंजय शुक्ला विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद रहे। कार्यक्रम का उद्देश्य पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को संरक्षित करना, वैद्यराजों के अनुभवों और ज्ञान का दस्तावेजीकरण करना तथा इस विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वन मंत्री केदार कश्यप ने कहा कि पारंपरिक वैद्यों को प्रमाण पत्र प्रदान करना खुशी की बात है। उन्होंने कहा कि अपनी जड़ों, संस्कृति और परंपराओं को सुरक्षित रखना जरूरी है। यदि वर्तमान पीढ़ी अपनी पारंपरिक विरासत की उपेक्षा करेगी, तो आने वाली पीढ़ियों तक इस ज्ञान को पहुंचाना मुश्किल हो जाएगा।
उन्होंने पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को पीढ़ियों से सहेजकर रखने वाले वैद्यराजों के योगदान की सराहना की और प्रमाण पत्र प्राप्त करने वाले सभी वैद्यों को बधाई दी। इस दौरान उन्होंने प्राचीन उपचार पद्धतियों के उपयोग को लेकर वैश्विक स्तर पर भी अपनी बात रखी।
केदार कश्यप ने कहा कि पारंपरिक वैद्यों का ज्ञान वनस्पतियों की पहचान, प्राकृतिक संसाधनों के अनुभव और पीढ़ियों से अर्जित समझ पर आधारित है। इस ज्ञान को केवल औपचारिक शिक्षा या डिग्रियों के माध्यम से हासिल नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा कि वैद्यराजों के अनुभवों और औषधीय पौधों से जुड़ी जानकारी को व्यवस्थित तरीके से संकलित करना जरूरी है। दस्तावेजीकरण से यह ज्ञान सुरक्षित रहेगा और भविष्य में नई पीढ़ी भी इससे परिचित हो सकेगी।
वन मंत्री ने कहा कि हमारे आसपास मौजूद पेड़-पौधों, फल-फूलों, जड़ों और वन उत्पादों का पारंपरिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में इनका उपयोग खान-पान और पारंपरिक उपचार में किया जाता था, लेकिन बदलती जीवनशैली के कारण इनसे दूरी बढ़ रही है।
उन्होंने औषधीय पौधों के संरक्षण, उनके वैज्ञानिक अध्ययन और उचित उपयोग को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। साथ ही अधिकारियों से पंचायतों की उपलब्ध भूमि, घरों की बाड़ियों और अन्य उपयुक्त स्थानों पर फलदार वृक्षों के साथ औषधीय पौधे लगाने को प्रोत्साहित करने का आग्रह किया।
केदार कश्यप ने कोदो, कुटकी, रागी और अन्य पारंपरिक मोटे अनाज के महत्व पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि ये अनाज हमारी खाद्य संस्कृति का हिस्सा रहे हैं और इनके उपयोग को फिर से बढ़ावा देने की जरूरत है।
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मिलेट्स के उपयोग को प्रोत्साहित किए जाने का उल्लेख करते हुए कहा कि भोजन में स्वाद के साथ उसके पोषण मूल्य और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को भी महत्व दिया जाना चाहिए। बस्तर पंडुम जैसे आयोजन स्थानीय खाद्य संस्कृति, पारंपरिक व्यंजनों और विलुप्त होती खान-पान की परंपराओं को पहचानने का अवसर देते हैं।
कार्यक्रम में पारंपरिक ज्ञान और औषधीय पौधों के संरक्षण के साथ स्थानीय लोगों की आजीविका बढ़ाने की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई। केदार कश्यप ने कहा कि स्थानीय वन उत्पादों, औषधीय पौधों और पारंपरिक खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता एवं उपयोगिता को पहचानकर उनकी बेहतर ब्रांडिंग, प्रसंस्करण और विपणन किया जा सकता है।
इससे स्थानीय उत्पादों को व्यापक बाजार मिल सकता है और ग्रामीण समुदायों के लिए रोजगार व आय के अवसर बढ़ सकते हैं। उन्होंने साल बीज सहित अन्य वन उत्पादों के मूल्य संवर्धन की संभावनाओं पर भी काम करने की बात कही।
वन मंत्री ने कहा कि पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान और प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखने के लिए दस्तावेजीकरण, जनजागरूकता और सामुदायिक भागीदारी जरूरी है। औषधीय पौधों के संरक्षण और पारंपरिक वैद्यों के अनुभवों को व्यवस्थित रूप से संकलित करने से इस विरासत को भविष्य के लिए सहेजने में मदद मिल सकती है।
कार्यक्रम में पारंपरिक वैद्यों के योगदान को सम्मानित करने के साथ उनके ज्ञान को संरक्षित करने और स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए समन्वित प्रयासों की आवश्यकता पर जोर दिया गया।